"सुनो"
"हाँ"
"तुम्हे
कैसे पता चलता
है कि, मैं तुमसे प्यार
करता हूँ?"
"क्यों पूछ रहे
हो?"
"मुझे जताना नही
आता, और पता भी नही
चलता कि तुम्हे
पता चलता भी है कि
नहीं कि मैं तुमसे प्यार
करता हूँ |"
"क्या हो गया,
इस उम्र में इतने भावुक क्यों
हो रहे हो?
"
"नही बस ऐसे
ही, जानने की
इच्छा हुई, कि प्यार के
होने का एहसास
तुम्हे कब होता है"
"मुझे?"
"हाँ"
"तब, जब मुझे
भी न दिखने वाली मेरी
एडियों की बिवाइयाँ
तुम देख कर कुछ नही
कहते, सब कुछ भूल जाने
वाले तुमको, बाज़ार
मे मेरी फटी
एडियाँ याद आती हैं और
चुपचाप सब्जी के
साथ तुम मेरी
एडियों के लिए क्रीम ले
आते हो |"
"बस"
"इससे ज़्यादा प्यार हो
भी क्या सकता
है?सिर्फ़ कहने
भर से प्यार
होता है क्या?"
"नही, पर मैने
तुम्हे अभी तक कुछ दिया
भी तो नही
!"
"क्या सिर्फ़ महँगे
तोहफे, या महँगी
चीज़ें देना ही प्यार है?"
"शायद नही ! पर
इससे खुशी तो मिलती है
न"
"खुशी तब मिलती
है जब कुछ बिना कहे,
बिना माँगे मिल
जाता है, मेरी तो सारी जिंदगी इसी एहसास मे कट गयी कि मुझे बिन माँगे सब कुछ मिलता रहा |"
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