“पायल!
ओ पायल! देखो
तो ज़रा रात
को 3 बजे किसके
घर मे सियापा
मचा हुआ है”
- दीप ने कहा
- "कोई तो भी
ज़ोर ज़ोर से
रो रहा है"
पायल
बड़ी मुश्किल से
आँखें खोलते हुए
बोली “क्या हुआ?"
दीप
ने भरी ठंड
मे पायल के
उपर से कंबल
उठाकर एक शॉक
देकर उसे उठाने
का राम-बाण
छोड़ दिया | पायल
उठ बैठी | आँखें
तो खुल गयी
थीं पर शायद
कान नहीं | वैसे
तो महिलाओं के
कान और आँख
ज़्यादा तेज़ होते
हैं, लेकिन इस
समय पायल की
सिर्फ़ आँखें खुली थीं,
कान अभी भी
बंद थे, और
दिमाग़ अभी भी
सो रहा था
| उसे समझ नही
आया की आख़िर
हुआ क्या है,
कौन जागा और
कौन सोया | बोली
“इतनी रात मे
सब सोते ही
हैं” | दीप ने
कहा सो नही
रहा “कोई रो
रहा है" |
“ओह!”
पायल ने अपने
कानो मे से
रूई निकालनी शुरू
की | दीप के
ख़र्राटों से बचने
और नींद की
ज़रूरत को पूरा
करने के लिए
अक्सर पायल को
अपने कानों मे
आधा आधा किलो
रूई भर लेनी
पड़ती थी |
खैर,
छोड़िए | फिलहाल पायल के
कान, आँखें और
दिमाग़ जो कि
कल दिन भर
उनके सहकर्मी भूषणजी
द्वारा खा लिया
गया था और
किसी काम का
नही बचा था,
धीरे धीरे जागना
शुरू हुआ | पायल को
भी रोने की
आवाज़ आई | बोली
“सियापा किसी और
के घर मे
नहीं ..अपने ही
घर मे पड़ा
है | रोने की
आवाज़ बगल वाले
कमरे से आ
रही है |” दोनो
उठ कर दौड़े
...दूसरे वाले बेडरूम
की तरफ तो
देखा … उनकी नौकरानी
रो रही थी
| “सुबुक सुबुक, हूँ,हूँ
हूँ - ज़ोर ज़ोर
से रोए जा
रही थी |
पायल
ने पूछा “क्या
हुआ? क्यूँ रो
रही हो आधी
रात में?”
उत्तर
सुन कर पायल
के पैरों के
नीचे से ज़मीन
खिसक गयी | समझ
नही आया की
क्या करे | मन
किया उसके और
खुद के बाल
नोच ले, साथ
मे दीप के
| नौकरानी ने दहाड़
मारते हुए कहा
..."मुझे अपने बॉय-फ्रेंड की याद
आ रही है"
दिमाग़
का दही बन
गया था, और
नींद का रायता
फैल गया था
| जैसे तैसे मामले
को ख़तम किया
गया | सुबह दीप
और पायल दोनो
को अपने काम
पर जाना था
सो सोने की
कोशिश करने चले
गये|
तीन
दिन सुकून से
निकले |
"दीप देखो
न बाहर रोशनी
नही है"
"रात मे
रोशनी नही होती
पायल, अंधेरा ही
होता है"
"अरे रोशनी
नहीं है"
"देखो एम.
सी. बी डाउन
हो गयी होगी,
तुम्हे सिखाया था ठीक
करना, जाओ एम.
सी. बी देख लो"
"अर्ररे रोशनी
नहीं है" अबकी
बार झल्लाते हुए
पायल ने कहा
|
दीप
ने कहा –“सुबह
सुबह मेंटेनेन्स वाला
कहाँ मिलेगा, आठ
बजे फोन कर
के बुला लेंगे
किसी को |सो
जाओ आज शनिवार
है छुट्टी है
|”
पायल
के मन मे
आया की एक
बाल्टी पानी उठा
के दीप के
सर पर डाल
दिया जाए, या
बेलन मार के
उठाया जाए, समझता
क्यूँ नही ये
बुद्धू आदमी |
"अर्रे हमारी
नौकरानी रोशनी नहीं है"
दीप
हड़बड़ा कर उठा
और बोला "ओह"
पायल
झल्लाई "बस ओह!
अरे कुछ करो
- चाय बनाकर कौन
देगा हमें!”
दीप
ने कुछ सोचा
और कहा "ओह!
हाँ"
पायल
का मन हुआ
की एक थप्पड़
रसीद कर दें,
ये आदमी जागता
क्यूँ नहीं | पकड़
के झकझोर दिया
पायल ने दीप
को | “जागो | हमारी
नौकरानी चली गयी
है कहीं | शाम
को तुम्हारे दोस्त
आएँगे तो खाना
तुम बनाओगे क्या?”
दीप की नींद
अब खुली | "ओह
हाँ! मैं पुलिस
को फोन करता
हूँ"
पायल
ने कहा – “कुछ
भी करो मुझे
बस नौकरानी चाहिए
| वरना अच्छा नहीं होगा
|”
रोशनी
दरअसल पायल के
जीवन की रोशनी
है | उसी रोशनी
के सहारे पायल
अपनी नौकरी से
लेकर फिल्म देखने
तक का काम
कर लेती है
| रोशनी, पायल की
परछाई है | जो
सुबह की चाय
बनाने से लेकर,
खाना बनाने, सफाई
और बच्चे को
संभालने तक का
सारा काम करती
है | इसी रोशनी
के सहारे पायल
अपनी जिंदगी मे
चैन का अनुभव
करती है |16-17 साल
की साँवली सी
लड़की, महज़ चार
फुट की लंबाई
| कद काठी बिल्कुल
साधारण - जैसे सीधे
किसी गाँव से
चली आई हो
! हाँ पहनावा ज़रूर
थोडा शहरी हो
गया था | किंचित
पायल के घर
के माहौल के
कारण | जो लगभग
सवा साल से
पायल के साथ
रह रही थी,
पूरी तरह ट्रेन
हो चुकी थी|पायल के
घर मे चीनी
का डब्बा पायल
को पता न
होगा लेकिन रोशनी
नींद मे भी
उठा के दे
सकती थी |
खैर
अभी समस्या यह
थी की रोशनी,
पायल के घर
से चली गयी
थी |
सबसे
पहले घर की
तलाशी ली गयी,
गायब क्या-क्या
हुआ हुआ है
| भगवान की दया
से, माफ़ कीजिए
रोशनी की दया
से घर का
कोई सामान गायब
नहीं हुआ था
| पायल को सुकून
आया की चलो
घर मे चोरी
नही हुई, और
दीप की सारी
टेंशन ही ख़तम
हो गयी| लेकिन
फिर वो भागी
कहाँ?
कहीं
अपने बॉय-फ्रेंड
के साथ तो
नही...? पायल का
दिमाग़ चलना बंद
हो चुका था
| और दीप ने
उस लड़की का
पता लगाना चालू
कर दिया था
|
रोशनी
के जाते ही
पायल का जीवन
अस्त-व्यस्त हो
गया | उसने कुछ
परिचितों और मित्रों
को खाने पर
बुलाया था, फोन
कर के सबको
मना कर दिया
गया की आज
दावत नही होगी
| पायल के मित्र
जो दावत के
इंतेज़ार मे दो
दिन से भूखे
बैठे थे, मायूस
तो अवश्य हुए
होंगे | एक तो
दावत के लिए
दो दिन कुछ
खाया नहीं उपर
से दावत भी
न हुई |मतलब
आम पकने के
इंतज़ार में पेड़
के नीचे बैठे
रहे और आम
को तोता कुतर
गया, और अपन
भोजन की जगह
भजन कर के
लौट आए | पायल
भी दुखी थी
आख़िर इसी समय
यह मुसीबत उसके
गले पड़नी थी
|
दोपहर
होते होते, पायल
को भूख लग
आई, बिस्कट-चाय
से पेट भरा,
दीप ने भी
कुछ आड़ा तिरछा
खाकर रोशनी हो
ढूँढने का काम
जारी रखा | शाम
चार बजे जब
भूख ने अत्यंत
प्रताड़ित कर दिया
तब -पायल को
याद आया चलो
कुछ नहीं तो
दाल चावल ही
बना लिया जाए
| और पायल ने
दुखी मन से
दाल चावल चढ़ा
दिए |दुखी मन
से बना हुआ
खाना, बनाने वाले
के मन से
दुगना दुखी होता
है, ऐसे खाने
को गले से
उतारना एक हिम्मत
का काम है
|
खैर
दाल चावल बन
गये और प्लेट
मे सज़ा दिए
गये | और टूटे
हुए मन से
खाए गये |
दिन
ढला, और शाम
होते होते - पायल
की जान सूख
कर काँटा हो
गयी | दिन भर
बिना रोशनी के
| हाय! कितना व्यर्थ है
ये जीवन | आगे
का जीवन कैसे
कटेगा | न जाने
कोई रोशनी जैसे
दूसरी मिलेगी भी
या नहीं | मिली
भी तो फिर
उसे इतनी ट्रैनिंग
देनी पड़ेगी | फिर
उसे सब सिखाना
पड़ेगा | हाय! कैसे
| कैसे होगा सब कुछ!
अब
सुबक सुबक कर
रोने की बारी
पायल की थी!
पायल ने रोना
शुरू किया | दीप
ने देखा तो
समझ नही आया
क्या बोलें | पायल
को लग रहा
था की जैसे
दीप को कोई
फ़र्क ही नही
पड़ता | इतनी मुसीबत
में वो इतने
शांत कैसे रह
सकते हैं | उन्हे
रोना क्यूँ नहीं
आ रहा | शायद
कोई सुंदर दिखने
वाली नौकरानी होती
तो अभी तक
दौड़ गये होते,
या उनके पास
उसका पर्सनल नंबर
भी होता! पर
ऐसा नहीं था
|
दीप
को जैसे कोई
फ़र्क ही नही
पड़ रहा था
| इतने शांतचित्त कैसे |
पुरुष
को तब तक
किसी बात से
फ़र्क नही पड़ता
जब तक उसकी
जेब पर डाका
न पड़ा हो,
या उसे खुद
की किसी ग़लती
होने का पता
न चल गया
हो, जिसके बारे
में वो कुछ
कर न सकता
हो और इस
में भी तब
तक भी मामला
शांत रहता है
जब तक उसकी
पत्नी के सामने
उसकी पोल न
खुल गयी हो
| पुरुष अधिकतर बातों को
आराम से लेते
रहते हैं | उन्हे
तब तक कुछ
फ़र्क नही पड़ता
जब तक उनकी
आत्मा पर चोट
नही पहुँचती!
तो
अभी न तो
दीप की जेब
पर डाका पड़ा
था - न पत्नी
के सामने कोई
पोल खुलने जैसी
कोई बात ही
थी | सो वे
शांतचित्त बने रहे
|
लेकिन
पायल रोए जा
रही थी, “मुझे
अभी के अभी
नौकरानी ला कर
दो दीप |” और
पायल का बी.पी. बढ़
गया | उल्टी भरने
लगी, साँस फूलने
लगी | पायल उठ
भी नहीं पा
रही थी | भूख
ज़ोर की लगी
थी पर खाने
का मन नही
हो रहा था
| यूँ कहिए की
कुछ खाने को
था भी नहीं
|
वैसे
शायद यह एक
बीमारी ही कहिए
कि किसी पर
अपने काम के
लिए इतना अधिक
निर्भर हो जाएँ
कि खुद कुछ
करने के नाम
से ही व्यक्ति
चिंतित हो जाए
|
चिंता
एवं गर्भ-धारण
के लक्षण एक
जैसे ही होते
हैं | चक्कर आने
लगें, उल्टी भरने
लगे, दिमाग़ काम
न करे, खाने
से मन ऊब
जाए, पेट गड़बड़
हो जाए तो
समझिए या तो
आपके पैर भारी
हैं या चिंता
से आपका सर
|
पायल
एक दिन मे
ही बीमार हो
गयी थी | पिचासी
किलो के भार वाली
पायल ने आज
पाँच किलो तो
आँसू ही बहा
दिए थे रोशनी
की याद में
|
जैसे
तैसे रात को
बाहर से खाना
मॅंगा कर खाया
गया और दिन
भर के विलाप
के पश्चात नींद
आने लगी थी
पायल को | रोशनी
का कुछ पता
नहीं था | लेकिन
बस अब थक
गयी थी | वैसे
भी आज दुख
के मारे पायल
नहाना भी भूल
गयी थी तो
आलस्य अधिक ही
आ रहा था
| पायल जाकर बिस्तर
पर गिर पड़ी
| दीप ने आकर
कहा – “सो रही
हो? - रोशनी बंद
कर दूं?”
जैसे
बुझती आग मे
कोई घासलेट डाल
गया हो, ऐसे
ही पायल फिर
भड़क उठी | कुछ
कुछ नींद के
मारे जो भूल
रही थी, दीप
ने फिर रोशनी
का नाम लेकर
याद दिला दिया
था | और रोने
धोने का एक
और दौर शुरू
हो गया |
विलाप
और प्रलाप में
रात निकल गयी
|
सुबह
दिन की रोशनी
तो आई, पर
पायल के जीवन
की रोशनी - हाय!
कल से गायब
थी | एक दिन
में जीवन उथल
पुथल हो गया
था, खाना तो
ठीक चाय भी
नसीब नहीं हो
पाई थी | घर
की सफाई तो
ठीक घर मे
किसी ने नहाया
भी नही था
| कहाँ घर में
दावत होने वाली
थी, लेकिन आँसुओं
मे उबला हुआ
दाल चावल ही
मिला था कल
|
हाय!
ये कैसे दिन!
रोशनी बिन! वैसे
तो घर मे
तीन ही प्राणी
थे, पायल उसका
पति और उनकी
बेटी | बेटी का
ध्यान तो पायल
रख रही थी
, पर पायल खुद
बड़ी बदहवास थी
| कहीं से बस
एक नौकरानी मिल
जाए | इतने में
एजेन्सी से फोन
आ गया | रोशनी
मिल गयी थी
| जिंदा थी और
सही सलामत थी
| अपने बॉय-फ्रेंड
के साथ कहीं
चली गयी थी
| और सीधे अपनी
एजेन्सी ही लौट
गयी थी | उसे
पता था इसके
बाद पायल के
घर मे तो
वापस आने मिलेगा
नहीं | इसलिए सीधे एजेन्सी
चली गयी थी
| वहाँ थोड़ी बहुत डाँट-डपट के
बाद किसी और
घर मे काम
पर जाने तो
मिल ही जाता
उसे |
बच्ची
ही थी | कच्ची
उम्र, शायद भारत
के किसी पूर्वी
हिस्से से भगा
कर या बहका
कर लाई गयी
थी | घरों मे
काम करना ही
उसकी आजीविका और
भविष्य था | हालाँकि
ये नही कहूँगा
कि ये सब
सही था या
है | पर फिर
भी उन बेचारी
लड़कियों से बेहतर
है जो इसी
तरह से ग़रीब
घरों, देहातों, आदिवासियों
के घरों से
लाकर बाज़ार मे
बेच दी जाती
हैं | उससे तो
कहीं बेहतर है
घरों मे नौकरानी
बन कर रहना
| जीवन वैसा नहीं
जैसा की एक
बच्चे को मिलना
चाहिए, एक लड़की
को मिलना चाहिए,
लेकिन हाँ फिर
भी बेहतर |
अब
रोशनी मिल गयी
थी! पायल सोच
रही थी क्या
किया जाए | क्या
उसे फिर घर
वापस लाना ठीक
होगा | फिर भाग
गयी तो | फिर
उसे अपनी मेहनत
और ट्रैनिंग का
ख्याल आया | फिर
उसे भूषणजी याद
आए | कहीं कोई
नौकरानी भूषणजी जैसी निकली
तो? उफ़ कैसे
संभालेगी! पायल ने
फ़ैसला किया - रोशनी को
एक मौका और
देंगे |
दीप
ने कहा नहीं
अब दूसरी किसी
लड़की को ले
आओ एजेन्सी से
| पायल नें कहा
"हाँ हाँ तुम
तो हमेशा दूसरी
ही ढूँढते रहो!
तुम्हे रोशनी से क्या
फ़र्क पड़ा था
सोच रहे होगे
की अबकी बार
कोई सुंदर सी
लड़की मिल जाएगी
क्यूँ? तुम्हे क्या पता
रोशनी को कैसे
कैसे ट्रेन किया
है मैने आएगी
तो वही" | पायल
के इस तर्क
का कोई उत्तर
दीप तो क्या
स्वयं नारायण भी
नही दे पाते
|
और
पायल जाकर रोशनी
को फिर अपने
घर ले आई
| दो-तीन दिन
में पायल की
जिंदगी पटरी पर
लौट आई |
इस
घटना को बीते
आज तीन महीने
हो गये थे
| बस पायल याद
करते करते खुद
पर हंस रही
थी कि एक
दिन ने उसको
कितनी, परेशानी मे डाल
दिया था | और
रोशनी उसके जीवन
का कितना महत्वपूर्ण
अंग बन गयी
थी |
रोशनी
शाम चार बजे
की चाय लेकर
पायल के पास
आई और बोली
...”भाभी नीचे मेरा
क्लचर गिर गया
है उठा लाऊँ?”
पायल
ने कहा “हाँ
जाओ ले आओ
|”
और
पायल अपने काम
मे लग गयी
| काम क्या वही
- भूषण जी, पता
नही कहाँ से
आ गये थे
| खुद से एक
काम नहीं होता
था | हर समय
ग़लतियाँ करते करते
पायल का जीना
हराम कर रखा
था | पायल सोच
रही थी - एक
नौकरानी को ट्रैनिंग
देना आसान है
इन भूषणजी से
एक काम सीधे
सीधे करवाने से
|
खैर
उसे ध्यान ही
नही रहा इस
सब में चार
से पाँच और
पाँच से छह
कब बज गये
| साढ़े छह बजे
जब फिर से
चाय की तलब
हुई तो आवाज़
लगाई – “रोशनी - चाय!!” जवाब
नही मिला! एक
- दो - तीन बार
आवाज़ लगाई! जवाब
नहीं मिला!
सात बजे
पायल ने फोन
घुमाया और बोली
- "हैलो! दीप - रोशनी नही
है!”
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