विपक्ष से ९९ के जननायक सड़क पर निकले। वे सड़क पर अक्सर निकलते हैं। एक जगह उन्हें एक मोची मिला। मोची चप्पल सिल रहा था। जननायक का मन भी चप्पल सिलने का हुआ। जननायक ने चप्पल सिली। मोची अगर भजिए बना रहा होता तो जननायक का मन भजिए बनाने का हो जाता। जननायक का मन ही ऐसा है।
सब कहने लगे कि अब जननायक ने मोची पर कृपा कर दी है, मोची के दिन फिर गए। मोची पर कोई असर नहीं हुआ था, वह अब भी चप्पल ही सिल रहा था।एक दिन एक जननायक की पार्टी का एक नेता उसके पास आया और बोला उसे वो चप्पल देखनी है जो जननायक ने सिली थीं।
मोची ने कहा –पता नहीं कहां हैं। तब उस नेता ने उन चप्पलों को देखने के लिए बहुत पैसा देने की बात की। मोची ने सोचा सिर्फ चप्पल देखने के पैसे?
नेता ने और उत्सुकता दिखाई, और कहा चप्पल छूने दोगे तो दुगने पैसे दूंगा।
पहले तो मोची ने सोचा पागल है। फिर मान गया। अब उसने वो चप्पल ढूंढनी शुरू की। लेकिन एक जैसी चप्पलों में कौन सी थी जिसपर जननायक ने हाथ आजमाए थे, पहचानना मुश्किल था।
उसे जैसा याद आया वैसी एक जोड़ी चप्पल लाकर उस नेता के सामने रख दीं। नेता की आंखों से आंसू बह निकले। उसने पहले तो हाथ जोड़े। फिर दंडवत लेट गया। फिर भी मन न भरा तो उन चप्पलों को उठाकर चूमने लगा, छाती से लगाकर रोने लगा। मोची यह सब देख रहा था।
अब वह नेता बोला ये चप्पल मुझे दे दीजिए। मोची पहले तो सोच रहा था कि दे दे, फिर बोला नहीं दे सकता, आप तो जानते हैं ये कितनी अनमोल हैं। मेरे पूर्वज भी चप्पल सिलते थे। मैं इन्हे पीडीयों की विरासत बनाऊंगा। मैं इनको संभाला कर रखूंगा। नेता करोड़ों रुपए की बोली लगाने लगा। मोची न माना।
वह बोला आप कहें तो ऐसी ही दूसरी चप्पल ले जाइए, एक लाख रुपए में ऐसी ही दे देंगे, कहिए तो जननायक का चेहरा भी चप्पल पर बना देंगें। ये वाली तो मेरे लिए अनमोल हैं। नेता मन मार कर दूसरी चप्पल लेने तैयार हो गया, बोला - "ये राज किसी को मत बताना कि तुमने मुझे असली वाली नहीं दी।"
नेता उन चप्पलों को एंटीक बताकर विदेश में बेचना चाहता था।
अगले दिन मोची ने एक मखमल का कपड़ा खरीदा। एक चौकी पर बिछा कर वो चप्पल रखीं। फूल बिछाए। दीप और धूप लगा दिया। जो आता उसे सुनाता कि ये वही वाली चप्पल हैं। सभी दंडवत करते। कुछ चढ़ावा चढ़ाते।
कुछ खरीदने के लिए बोली लगाते। जो ज्यादा जिद करता उसे मोची वैसी ही चप्पल बनाकर देने की बात करता। वे लेकर जाते।
कुछ ही दिनों में पार्टी कार्यकर्ताओं को कतारें लगने लगीं। केरल से भी कार्यकर्ता दर्शन को आए, साथ कम्युनिस्टों को लाए। कम्युनिस्ट सदा से माओ या मार्क्स की चप्पल पूजना चाहते थे। लेकिन मार्क्स के अवतार ने जिन चप्पलों में टांके लगाए वे भी दर्शनीय और प्रेरणादायक थीं। दो चप्पलों की अवधारणा को घोर रूढ़िवादी और अमानवीय मानते हुए वामपंथी विचारकों का मत है कि हर व्यक्ति के पास कम से कम तीन चप्पल होनी चाहिए। जहां अतिरिक्त चप्पल मोचियों के लिए अधिक रोजगार का सृजन करती, वहीं तीसरी चप्पल से किसी को भी चप्पल टूटने पर परेशान नहीं होना पड़ता। चार चप्पल होना पूंजीवादियों को फायदा पहुंचाती है और समाज में असमानता का भाव उत्पन्न कर सकती है। अतः अमीर गरीब सभी को तीन चप्पल लेकर रखना चाहिए। अमीरों के पास बहुत अधिक न हो और गरीबों के पास थोड़ा सा अतिरिक्त हो।
चमत्कारी चप्पलों ने मोची की किस्मत खोल दी थी। जननायक ने चप्पल नही सिली थीं, मोची की किस्मत सिल दी थी। मोची की दुकान के आसपास चाट पकौड़ी के ठेले लगने लगे। मोहब्बत की दुकानों में मोहब्बत का शरबत मिलने लगा। सोनू सूद ने जूठे खाने की सच्ची दुकान लगाने के लिए कड़ाही और करछुल भेजे। कुछ लोग जूता खाने आते, कुछ जूठा खाने आते।
भीड़ सभालने के लिए चार हवलदार तैनात करने पड़े। मोची की दुकान बड़ी हो गई, शोरूम जैसी। जिसमें सबसे ऊपरी तल पर पूजनीय चप्पल दर्शनार्थ रखी गई थीं। दूसरे तल पर जननायक मर्चेंडाइज मिलता था। जिसमें जननायक की फोटो वाली चप्पल, जूते आदि मिलते थे। सबसे नीचे वाले तल पर दफ्तर और बिलिंग काउंटर था। साथ ही चप्पलाकार की–रिंग, इयर रिंग, रिस्टबैंड, लॉलीपॉप आदि मिलते थे। शोरूम के बाहर छोटे छोटे बच्चे उन चप्पलों की फोटू बेचते थे। वास्तुशास्त्री उन चप्पलों को घर के ड्राइंग रूम में रखने से वस्तु दोष दूर होने के टोटके बताते थे। कुछ बाबा की रेड बुक के जानकार बताते थे कि रेडबुक टोटका नम्बर ९९ के अनुसार अगर एक बार वो चप्पल किसी के सर पर पड़ जाए तो गंजे सर पर भी बाल उग सकते हैं। प्रसिद्ध सेलिब्रिटी चावला जी ने नुस्खे की पुष्टि की। उन्होंने कहा - पहले मैं गंजा था। मैं परेशान रहता था। लोग मुझे गंजा कहते थे। मेरे सरपर बाल नहीं थे। मैं हार मान चुका था और निराश हो चुका था। फिर किसी ने मुझे इन चप्पलों के बारे में बताया। बस एक बार इस नुस्खे को आजमाया उसके बाद मेरे सर पर घने मुलायम सफ़ेद बाल उग आए।
चप्पलों की कसम खाई जाने लगी। सौगंध मुझे है चप्पल की पूंजीवाद बढ़ने दूंगा।
प्रेमी प्रेमिका कहते - जैसे एक चप्पल के बिना दूसरी किसी काम की नहीं वैसे हम दोनों भी एक दूसरे के बिना किसी काम के नहीं रहेंगे। हमारा तुम्हारा साथ इन्ही चप्पलों की जोड़ी जैसा है। बस कोई जननायक टाँके लगा दे तो हम सदा के लिए एक दूसरे के हो जाएं। कुछ कार्यकर्ता तो चप्पलों को साक्षी मानकर शादी करने लगे। पादरी नरूला ने चप्पलों को ही होली ग्रेल बता दिया। कुछ वैज्ञानिक दृष्टिकोण वाले लोगों ने चप्पलों को ही नया भगवान बता दिया। चप्पल निर्माण दिवस मनाया जाने लगा। चप्पल चालीसा और भजन के वीडियो यूट्यूबर्स ने बना कर यूट्यूब भर दिया।
चप्पल अब राष्ट्रीय विमर्श का विषय थी। टीवी पर पार्टी प्रवक्ता जननायक और उनकी चप्पल लीला का महिमा मंडन करते और सत्ता पक्ष के प्रवक्ताओं के पास हमेशा की तरह इसका कोई उत्तर नहीं होता। वे केवल सर पकड़े बैठे रहते। लेकिन सत्ता पक्ष के शीर्ष नेताओं की सोच कुछ और थी, सुनने में आया कि लोगों की आस्था को देखते हुए चप्पल पर्यटन पर जोर देने की बात चल रही है। चप्पल दिवस की चर्चा मीडिया में चल निकली। चप्पल सेस लगाने का प्रस्ताव वित्त सचिव ने रख दिया। चप्पल को भी कैपिटल घोषित करने की योजना बनाई जाने लगी। पाकिस्तान से भी चप्पल कॉरिडोर बनाने की मांग उठी।
जननायक की पार्टी के समर्थक विरोधी पार्टी के समर्थकों को चिढ़ाते कि भक्तों देखो हमारे जननायक की चप्पल लीला। तुम अंधभक्त लोग कभी जननायक का न्याय और क्रांति नहीं समझ सकते। दूसरी तरफ के समर्थक खीझ उठते।
कुछ ही महीनों में मोची अमीर हो चुका था, चार शोरूम खुल चुके थे।
हर शोरूम में वैसा ही चप्पलों का मंदिर उसने बनवाया था। उसके हर शोरूम के मैनेजर दावा करते कि असली चप्पल यहीं रखी हुई हैं। पित्रोदा से लेकर जुबैदा बॉस, बंटी से लेकर बंटाधार और हाफिज सईद तक के साथ उसकी तस्वीरें उसके शोरूम की दीवारों पर लगाई गई थीं। वह पार्टी की सभाओं में जाता, मंच पर चप्पल वाले के रूप में उसका सम्मान किया जाता।
यह सब देखकर वह पहला नेता जो चप्पल ले गया था एक दिन हाईकमान से मिलने गया और कहने लगा असली चप्पल तो उसके ही पास हैं, मोची धोखा करता है। हाईकमान चप्पल की महिमा जानता था। हाईकमान ने एक बिस्कुट उसकी तरफ फेकते हुए कहा - "पहले क्यों नहीं बताया?"
वह नेता बोला -" छह महीने से प्रयास कर रहा था। यही बताने के लिए लेकिन आप मिलते ही न थे।"
हाईकमान ने मोची को बुलाया और कहा -" क्यों बे ये बता कि ये महाशय तुझसे चप्पल ले गए थे?"
"हाँ ले गए थे।"
"तो फिर तेरे पास नकली चप्पल हैं?
"मेरे पास तो असली हैं। मैं तो उनकी रोज पूजा करता हूँ। कार्यकर्ताओं और पत्रकारों को चरणामृत भी देता हूँ।"
"लेकिन ये महाशय तो कहते हैं असली इनके पास हैं?"
"नहीं हैं, ये झूठ बोलते हैं। मैंने तो नक़ल बना कर दी थीं। ऐसी नक़ल तो रोज दो-चार दर्जन बेचता हूँ। "
"लेकिन ऐसे तो विवाद बढ़ जाएगा। ये चप्पल अब पार्टी की संपत्ति हैं। तुम दोनों के पास जो चप्पलें हैं उन्हें पार्टी कार्यालय में जमा करवा दो। हम देखेंगे क्या कर सकते हैं।"
नेता तो मान गया, मोची न माना। मामला सुप्रीम कोर्ट पहुँच गया। छुट्टियों में भी आधी रात को सात जजों की बेंच बैठी। मु.न्या. ने अध्यक्षता की। पार्टी की तरफ से सिफ़र साहब और मोची की तरफ से चैंबर बाबू ने मोर्चा संभाला। मामला वर्चस्व का था।
केस पर लगातार सात दिन और सात रात सुनवाई हुई। फैसला पार्टी के पक्ष में आया। चप्पल पार्टी को और मुआवजा मोची को देने की बात हुई।
उस दिन मोची के शोरूम पर भारी संख्या में पार्टी कार्यकर्ता जमा हुए, उतना ही पुलिस बल जमा हुआ। चप्पलों को बड़े से ट्रक में शान से के मोची की दूकान से पार्टी कार्यालय लाया गया। जुलूस सारे शहर में निकला। पटाखे चले, मिठाई बंटी। झबरे और तगड़े सभी कार्यकर्ताओं ने नागिन डांस किया।
मौसमी और मिश्रा ने कूद कूद कर बताया कि वो कितनी उतावली थीं - वो देखो चप्पल, वो देखो चप्पल, कहते हुए माइक लेकर छत से कूद पड़ीं।
एक पार्टी प्रवक्ता ने बताया कि - यह हमारे पार्टी में ही संभव है जहाँ आलाकमान चाहे तो किसी भी पद पर किसी को भी बिठा सकती है। अब देखिये वो चप्पल आज कार्यालय में स्थापित होकर हमारे हर कार्यकर्ता को प्रेरणा देगी। हमारे नेतृत्त्व की बात कोई नहीं टालता और पार्टी अनुशासन में रहती है।
गठबंधन के नेताओं ने इसे क्रांतिकारी कदम बताया और भरोसा जताया कि इस कदम से सबको बराबरी का अधिकार मिलेगा। हर क्षेत्र में क्रांति आ जाएगी। फिलिस्तीन आज़ाद हो जाएगा और पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था पटरी पर आ जाएगी। चीन से सम्बन्ध सुधर जायेंगे। लखनऊ की सड़कों से सांड कम हो जाएंगे। दिल्ली को नया मुख्यमंत्री मिल जाएगा।
रविश ने पूरा एक घंटे का शो बनाया - ये देखिये लोकतंत्र का उत्सव है। आज वे चप्पल जो समाज के सबसे निचले तबके से उठकर आज हमारी पार्टी कार्यालय में स्थापित की जा रही हैं। यही समाजवाद है जिसकी कल्पना हम करते रहे हैं। ये चप्पल याद दिलाती रहेंगी कि एक जननायक कैसे सबकी जिंदगी में टाँके लगाने के लिए गली गली घूमा।
जर्मन ने बताया - दोस्तों क्या आप जानते हैं, अब पार्टी इन चप्पलों को हमेशा के लिए अध्यक्ष बनाकर एक बहस को समाप्त कर सकती है। ९९% देशों में चप्पल किसी पार्टी न चुनाव चिन्ह ही नहीं बन सकी हैं और आज अध्यक्ष भी बन सकती हैं। दोस्तों ... दोस्तों ... दोस्तों। चप्पल चप्पल चप्पल।
वरुण ग्रोवर अभी तक इस बात पर हंस रहे थे कि वो लोग अयोध्या हार गए। उन्हें अभी तक चप्पलों पर हंसने की फुर्सत नहीं मिल रही थी।
अजीत भारती वीडियो नहीं बना पाए क्योंकि उनके घर पर हॉन्डुरास की पुलिस नोटिस देने आई थी।
https://x.com/bstvlive/status/1818249028704088371
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