बस में चार पहिए, दो दरवाजे, बाकी का खांचा तो बाहर से दिख गया था। बस के अंदर ड्राइवर की सीट, सीट पर लटका मटमैला तौलिया, एक घिसा हुआ स्टीयरिंग, सही सलामत गियर, ड्राइवर के पीछे गद्दी वाली एक बेंच, बहुत सारी मैली सीटें, जिनपर पीला पेंट लगा था या किसी प्रकार की सब्जी कहना मुश्किल है, कुछ पर ग्रीस के दाग जरूर थे। कुछ सीटों की गद्दी उखड़कर बगल वाली विंडो सीट पर बैठने को उछल रही थीं। अनगिनत खिड़कियां जिनका कांच बंद करने और खोलने के लिए किसी न किसी सवारी के बीच लड़ाई होने की प्रबल संभावना थी। ड्राइवर की सीट के बिलकुल पीछे एक पैनल खुला था या टूटा कह नहीं सकते क्योंकि बेतरतीब नट बोल्ट से सेट या अपसेट किया गया था, जिसमें से नीचे देखने पर सड़क देखी जा सकती थी।
सड़क तो सामने से भी देखी जा सकती थी, लेकिन नीचे वाला दृश्य सड़क को अधिक निकट से दिखाता। भोपाल और सागर के बीच रोज सुबह चलने वाली इस बस में न जाने और कौन-कौन सी जुगाड़ करके चलने पर मजबूर किया गया होगा यह तो ड्राइवर ही जानता होगा या उसका सहायक। फिलहाल बस में एक ड्राइवर और तीन सहायक थे। बस चालू करने के लिए कोई स्विच या चाबी नहीं थी। हॉफ पेंट और जंग के रंग वाली टी शर्ट पहने ड्राइवर ने न जाने कौन सा मंत्र फूंक कर एक तार का गुच्छा खींचा और बस चालू हो गई।
सवारियां अपने स्थान पर बैठ गई, जिनमे एक दुल्हन, उसकी मां, बहने और परिवार के अन्य लोगों के साथ एक सहेली और दो चार पड़ोसी थे।
साथ में थे एकमेव जीजाजी। जीजाजी कहां बैठेंगे इस बात में संशय नहीं था, क्योंकि मेहमान जी थे उन्हें तो खुद चुनी हुई जगह मिलनी ही थी। उन्होंने चुनी ड्राइवर के पास सबसे आगे वाली सीट। क्योंकि यही वो सीट थी
जहां चकल्लस सबसे कम होने की संभावना थी। जय बजरंगबली के उद्घोष के साथ बस चली और साथ ही चल पड़ी चकल्लस।
देखो सब जने आ गए?
कोनऊ छूट तो नई गओ?
पानी की टंकी रख ली थी?
डिस्पोजल काय में रखे?
नारियल को बोरा आंगें ले आओ। नदी–नरवा पे चढ़ाने पड़ें।
तुमने चाबी काय में रखें।
अरे यार हमाई लिपस्टिक छूट गई।
काय अपनो लाल सूटकेस डिग्गी में रखवा दओ?
चकल्लस सुनकर ड्राइवर और उसके तीनों सहायक भी मूड में आ गए और अपनी चकल्लस करने लगे। अधिक तो समझ नहीं आया लेकिन ड्राइवर तीन में से दो को आगे उतरने को कह रहा था और तीनों उतरने के लिए तैयार नहीं थे। ड्राइवर का कहना था कि जिसके पास राजश्री हो वह बैठा रहे बाकी दो उतर जाएं और अगली गाड़ी से आएं। और तीनों सहायक बारात के साथ ही जाना चाहते थे। ड्राइवर ने एक जगह गाड़ी रोकी और तीनों को नीचे उतर कर आपस में फैसला करने को कहा। तीनों उतरे और न जाने कैसे दो मिनट में फैसला कर लिया। एक चढ़ा और बस चल पड़ी।
तब तब सवारियां भी स्थिर हो गई थीं और ड्राइवर से गाना लगाने की मांग कर रही थीं। ड्राइवर ने सूचना दी कि बस में म्यूजिक सिस्टम नहीं है। मनोरंजन के लिए खिड़कियां खड़कती हैं, वही संगीत है।
बस के ड्राइवर का नाम था बाबू। जो भी हो बताया तो उसने यही था। बस ने जैसे ही रफ्तार पकड़ी उसकी राजश्री की तलब ने भी जोर पकड़ा।
इतने में बारात में सबसे सियाने यानी दुल्हन के भाईसाहब आगे आकर बैठ गए। ड्राइवर को कुछ नदी के पास धीमा चलने या रोकने की हिदायत देने ताकि नारियल फोड़ा या फेका जा सके।
ड्राइवर से भाईसाहब ने नाम, पता आदि पूछा। ड्राइवर ने बताया उसके पांच बच्चे हैं। और वह फलां गांव का है। ड्राइवर को कहीं बीच में नाश्ते के लिए रोकने को कहा गया।
ड्राइवर ने भाईसाहब से पूछा - "आपका ब्याह हो गया?"
भाईसाहब ने बताया - "अभी नहीं।"
ड्राइवर अगले ही क्षण कहने लगा - "आप हमको अपनई समझो, हम तो केवल आपई के हैं। आपके अलावा और कोई नहीं है हमारा।"
भाईसाहब घबराए, वैसे ही कुंवारे हैं और अब ये पांच बच्चों का बाप उनके गले पड़ रहा है। बोले - "उन पांच बच्चों का क्या होगा?"
ड्राइवर बोला –"वे भी आपई के सहारे हैं।"
भाईसाहब और घबराए, बोले -" क्या चाहिए ये बताओ।"
"बोला बीस रुपए दे दो राजश्री के लिए।"
एकमेव जीजाजी ने भाईसाहब को व्यंग्य से देखा और बोले - "दे दो, इसके मुंह में गुटका रहेगा तो चुप रहेगा, नहीं तो आज हमको सरहज मिली समझो।"
एकमेव जीजाजी का यह पहला अवसर था जब मौका मिला था मेहमान बनकर किसी विवाह में जाने का।
वैसे तो जीजाजी की इज्जत उस तरफ से उतनी ही है जितनी अपने घर में दाल बघारते हुए होती है। लेकिन फिर भी इस बार हिदायत दी गई कि थोड़ा मेहमान की तरह पेश आना, कुर्सियां उठाने मत लग जाना। अपना सूटकेस भी मत उठाना। थोड़ी अकड़ भी दिखा लोगे तो चल जाएगा क्योंकि आप उधर मेहमानजी हैं। सेवा साले करेंगे। जीजाजी के मन में भी लड्डू फूटा अगर कहो तो बैठने के लिए चक्का वाली कुर्सी ही मंगा ली जाए। न मिलने पर थोड़ा मुंह फुला लेंगे। ये तो जीजाजी को दी गई हिदायतें थीं, दूसरी तरफ भी माहौल बनाया गया कि ये थोड़े अकडू हैं, बात कम करते हैं, काम इनसे एक नहीं होता, वजन उठता नहीं और गुस्सा बहुत करते हैं। दोनों तरफ मामला ऐसा हो गया कि जैसे दोनों तरफ से सावधान रहना है।
थोड़ी देर में सब को न जाने कैसे भूख लगने लगी, नाश्ता नाश्ता की करुण पुकार और हाहाकार सुनाई देने लगा। बाबू से कोई ठीक ठाक स्थान पर रोकने की मिन्नतें की जानें लगीं। बाबू भी थोड़ा आगे, थोड़ा आगे करता हुआ पीछे तीन चार कस्बे छोड़ चुका था। अगर एकाध घंटे बस न रुकती तो शायद कोई न कोई सीट नोचकर खाने लगता। वही सीट जो उखड़कर खुद विंडो सीट पर बैठने के लिए अपनी जगह से उछल रही थी और जिसपर चटनी या ग्रीस या पेंट पहले से लगा हुआ था। राहतगढ़ से बेगमगंज के बीच की सड़क आज भी वैसी थी जैसी पंद्रह साल पहले थी। विकास के प्रकोप से बनती होगी लेकिन पहली बरसात में धुल भी गई लगती थी। या ये वाली सड़क शायद कांग्रेस का कार्यकाल याद दिलाने के लिए ऐसी छोड़ी गई थी। सड़क की खड़र बरड़ ने भूखे पेटों ने अंगों को उलटना पलटना शुरू कर दिया। गाड़ी जाकर रुकी गैरतगंज में, पहले पेट के अंग अपनी जगह पर लाने के लिए लोगों ने हाथ पैर खींचे फिर नाश्ता किया।
अबकी बार जब गाड़ी चली तो सहायक ने भाईसाहब से पूछा, शादी है किसकी? बताया गया दुल्हन उधर बैठी है।
वह कहने लगा – "आजकल उल्टो होन लगो है। पहले बरात आउत हती अब जाउत है। मानो एक बात है जो बैनर आगे लगो है ओ में तो काऊ और है।"
"नहीं इन्ही का बैनर है। यही हैं।"
"नहीं हैं भैया, कोई और हैं। इनकी तो शकल नहीं लग रही वैसी।"
"अरे जेई हैं।" दो चार लोग एक साथ बोले।
"हम नहीं मानत।"
"तुमाए माने से का!"
"रामधई कहो तो बैनर से मिलवा दएं! अलग है।"
"अरे जेई हैं!"
"हम नहीं मानत।" यह कहते हुए सहायक ने बस रुकवा दी। ड्राइवर ने मुंह में गुटका था। उम्म हम्म करते हुए रोक दी। सहायक उतरा और बस के बाहर से बैनर उतार लाया।
बस चल पड़ी। सहायक बैनर खोलकर दुल्हन और बैनर की शकल मिलाने लगा। कहता है जे बिन्ना नैय्ये।
"जेई आएं।" सब चिल्लाए।
तब ड्राइवर ने मामला संभालते हुए कहा – "काअ पीछे पाओ अय, फोटू में फिएक्टर लग जात आजकल।"
जैसे तैसे बारात भोपाल पहुंची। लड़के वालों ने ढोल, फूल और पोहे से बारात का स्वागत किया। समय तो पूड़ी का था लेकिन पोहे भी अपना काम कर गए।
कार्यक्रम की लंबी सूची थी। दुल्हन को पार्लर जाना पड़ा। तीन घंटे के मेकअप के बाद खबर मिली कि दुल्हन रो रही है। उसका मेकअप खराब कर दिया गया था। इधर दुल्हन की मां भी रोने लगी। इस विलापमयी माहौल को संभालते हुए येन केन प्रकारेण दुल्हन दूसरे पार्लर ले जाई गई। वहां दो घंटे की मशक्कत के बाद भी कोई असर न हुआ। दुल्हन अब भी दुखी थी। फिर वह तीसरे पार्लर में ले जाई गई। जहां तसल्लीबख्श तरीके से मेकअप की मरम्मत हुई और विवाह कार्यक्रम आगे बढ़ने के संकेत मिले। लगता तो यही था कि विवाह का मुहूर्त मेकअप में निकल जाएगा। जीजाजी की एक संभावित सरहज ने कहा मासाब के यहां की शादी में कुछ भी हो सकता है।
लेकिन पार्लर वालों की असीम कृपा से जो कार्यक्रम सात बजे होना था, ग्यारह बजे होने के आसार दिखने लगे।
इसी बीच खाने का कार्यक्रम शुरू हुआ। जीजाजी के सालों, और सालों के दोस्तों ने पैर छूने के बहाने बार बार जीजाजी के पैजामे से हाथ पोंछे। थोड़ी ही देर पहले सब उनके कमरे में तैयार होने घुसे थे और जीजाजी को आतंकित कर के निकले थे। एक तो होटलों के बाथरूम में लगे हुए तरह तरह के नल और सिस्टम आसानी से समझ नहीं आते, जब तक समझ आते हैं कमरा छोड़ने का समय आ जाता है। । दो कहकर घुसे थे बारह धड़धड़ाते आ चुके थे।
साले बाथरूम में घुसते, फिर अंदर से आवाज लगाते पानी नहीं आ रहा, दो तीन बार तो जीजाजी ने नल से पानी निकालने के इंस्ट्रक्शन ब्रॉडकास्ट किए, चौथी बार थक गए। फिर एक साले को नियुक्त किया। लेकिन अब सालों को आनंद आने लगा था। हर कोई कहता जीजाजी आप ही सिस्टम बताओ इनका बताया समझ नही आया। जीजाजी को लगा वो सुलभ शौचालय के बाहर ड्यूटी पर बैठ गए हैं। खीझकर चिल्लाने वाले थे कि उनकी शक्ल देखकर संभावित विस्फोट उन सालों की बहन को समझ आ गया। लक्षण जीजी के चेहरे पर दिखने लगे और तब जाकर सालों ने कमरा छोड़ा। इस समय अपने ये साले जीजाजी को महादेव की बारात के बाराती लग रहे थे।
फिलहाल बारात नाचते गाते पहुंच चुकी थी। बारात का जोरदार स्वागत चल ही रहा था।
नारियल, माला, लिफाफे बांटे जा रहे थे। गले मिलने वाली औपचारिकताएं चल रही थीं। डीजे की ढिंचक-ढिंचक धड़क-धम के बीच में मंगल गान चल रहा था। कि अचानक डीजे का ट्रक खुद नाचने लगा और ढलान से लुढ़ककर एक घर में घुस गया।
अब दो समारोह साथ में चल रहे थे। एक तरफ बारात का स्वागत और दूसरी तरफ डीजे ट्रक ने जो बाउंड्री तोड़ी थी उसका निरीक्षण। कौतूहल का विषय दूल्हा नहीं डीजे का ट्रक अधिक था।
फिर भी भाईसाहब और उनके मित्र दूल्हे को गोद में उठाकर मंच पर ले ही आए। ताकि दूल्हा जाकर डीजे ट्रक को न देखने लगे। जीजाजी दर्शक बने थे। उन्होंने ईश्वर का धन्यवाद किया कि उनके विवाह में महादेव की इस सेना से उनका पाला नहीं पड़ा। अन्यथा इन शिवगणों ने दो चार बार तो उठाकर पटक ही दिया होता।
बाद में पता चला कि डीजे कांड बाबू का किया धरा था। डीजे ट्रकवाले ने टायर के नीचे एक टेक लगाने को कहा था। कोई न मिला तो बाबू से कह दिया। बाबू को कुछ न मिला तो छोटी सी ईंट लाकर ट्रक के नीचे फंसा दी। डीजे वाला आश्वस्त हो गया, और बिना गियर डाले, न्यूट्रल में छोड़कर ट्रक से उतर गया। किसी गाने की ढिंचक ढिंचक में ईंट का चूरा हो गया और ट्रक चल पड़ा।
जीजाजी की संभावित सरहज ने फिर कहा मासाब के यहां की शादी में कुछ भी हो सकता है।
खैर ट्रक का कार्यक्रम उधर चल रहा था, इधर वरमाला का समय (भारतीय रेल के समय अनुसार) चार घंटे देर से सही, हो गया था। दुल्हन को स्टेज पर लाने की तैयारी की जा रही थी। दुल्हन बाहर खड़ी थी, दूल्हा मंच पर विराजमान था। दुल्हन चाहती थी कि उसके भाई एक चुन्नी उसके सर के ऊपर पकड़ कर चलें, लेकिन चुन्नी नहीं मिल रही थी। समय निकल रहा था। जीजाजी की संभावित सरहज ने अपनी एक सहेली की चुन्नी मांगी और उपयोग करने के लिए दे दी यह कहते हुए कि मासाब के यहां की शादी में कुछ भी हो सकता है।
दुल्हन अपनी टीम के साथ अपने मिशन पर निकली। फिर भी कुछ कमी थी। किसी को कमी समझ नहीं आ रही थी। मिशन चल रहा था। दुल्हन स्टेज पर पहुंच चुकी थी। दूल्हा दुल्हन आमने सामने खड़े थे। तभी किसी को समझ आया कमी कहां थीं। इस अवसर का मुख्य आकर्षण,वरमाला गायब थी। वरमाला मंचन होना था और दुल्हन हाथ में बिना वरमाला लिए स्टेज पर खड़ी थी। रात के ग्यारह बज रहे थे।इस समय फूल वाला मिलना मुश्किल था। जीजाजी सजावट के फूलों से माला बनवाने की योजना बनाने लगे थे। अचानक माला मिल गई। आम शादियों में दुल्हन से ज्यादा सजी धजी सुंदर लड़कियां, थाल में वरमाला लेकर आती हैं। यहां केशविहीन अधेड़ गुड्डू भैया हाथ में अखबार में लिपटी हुई वरमाला लेकर पहुंचे।
संभावित सरहज ने फिर कहा मासाब के यहां की शादी में कुछ भी हो सकता है। मंडप में यह वाक्य कहने के अनेक अवसर उन्हें मिले। उन्होंने मौका न छोड़ते हुए हर बार कहा।
पंडित जी ने दूल्हा दुल्हन को वचन दिलाए, जीजाजी ने अपने साले और संभावित सरहज से भी वचन सुन लेने का इशारा किया। कहने लगे अभी मौका है इसी मंडप में निपट लो, वरना भाईसाहब पर आजकल पांच बच्चों के बाप बाबू डोरे डाल रहे हैं। दोनों ने इग्नोराय नमः कहते हुए बगलें झांकी।
पंडित जी ने भी वर वधु को आशीर्वाद दिलवाते हुए अपना भाषण समाप्त किया सब ने महावीर भगवान का जयकारा करते हुए विवाह संपन्न होने की घोषणा की।
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