शुक्रवार, 29 मार्च 2024

भारत एक असहमति प्रधान देश है

असहमति लोकतंत्र का अनिवार्य अंग है। हमारे देश में सर्वसम्मति से तो दालभात भी नहीं बनता। लोग दाल पर सहमत हो जाएं तो उड़द-अरहर पर असहमत हो जाएंगे।

इसी सब के चलते भारत असहमति प्रधान देश बन गया है। यहाँ हर कोई एक दूसरे से असहमत है। अवसर मिलते ही असहमति व्यक्त कर दी जाती है। या यूं कहें कि हर व्यक्ति असहमति व्यक्त करने के लिए अवसर की प्रतीक्षा में तत्पर रहता है।
कोई किसी से सहमत नहीं है चाहे वो परिवार हों, पड़ोसी हों, पड़ोस के गांव के हों या राज्य के। कई बार तो आदमी अपने आप से भी सहमत नहीं होता। ऐसे में एक दूसरे का विरोध करने वाले राजनैतिक दलों से क्या ही अपेक्षा की जाए। राजनैतिक दलों का काम ही एक दूसरे से असहमत रहना है। संसद और चुनावी सभाओं में सहमति–असहमति से बोर हो चुके राजनैतिक दल गठबंधन करते हैं। गठबंधन में सहमति और असहमति बिलकुल लिव इन की तरह होती है। दो दल साथ में होते हैं, सारे कर्म और कांड साथ में करते हैं लेकिन अपने रिश्ते से इनकार करते हैं। साथ रहते हैं लेकिन अपने वोटबैंक के सामने स्वीकार नहीं करते। मौका मिलने पर एक दूसरे पर धारा 21 जरूर लगवा सकते हैं। जैसे कह रहे हों हमने साथ में सरकार तो चलाई लेकिन इसमें हमारी सहमति नहीं थी। उन्होंने जबरदस्ती हमसे सरकार चलवा ली।
बिहार में तो रात भर में गठबंधन बदल जाता है। जैसे मुख्यमंत्री कुछ फूंक लेते हैं तो लालटेन टांग लेते हैं और नशा उतरते ही फूल। ये लालटेन और फूल वाले भी चंद्रमुखी और पारो की तरह अपने देवदास को प्रेम करती हैं। पारो ब्याही तो कांग्रेस से है, पर सत्ता के लिए देवदास जब नशे में द्वार पर आता है तो व्याकुल हो उठती है। इधर चंद्रमुखी तो वैसे भी सबको अपने से मिलाने के लिए तैयार बैठी हुई है। देवदास के पहुंचते ही स्वागत को तैयार मिलती है।
यही हाल दिल्ली में है। दिल्ली में जो अच्छा है, पंजाब में खराब है। सोचने की बात है कि क्या कांग्रेस के इतने बुरे दिन आ गए कि अपने आत्म सम्मान को किनारे रखकर उसी के साथ गठबंधन कर लिया जो दिल्ली में उनके पतन का कारण बना। उसपर भी कम सीटों में मान गए, तुर्रा ये कि पंजाब में दोनों अलग लड़ेंगे। मतलब दिल्ली में गले में बाहें डालेंगे और पंजाब जाकर फंदा। सोचकर देखिए प्रचार क्या गजब का होगा। सुबह दिल्ली में कांग्रेस वाले कह रहे हैं, हमारे गठबंधन को वोट दीजिए। हम तो एक माता की दो संतानें हैं और शाम को वही कांग्रेस वाले पंजाब में कह रहे हैं भाई है तो क्या हुआ बात जमीन की आयेगी तो गला काट देंगे। दिल्ली में आप–कोन, पंजाब में आपकौन?
वैसे तो दिल्ली के अवतारी (वे स्वयं कहते हैं कि धरती पर उनका जन्म फलां प्रयोजन से हुआ है) मुख्यमंत्री के जेल जाने के बाद कांग्रेस के पास अवसर था अपनी खोई हुई शक्ति को पुनः जगाने का। उनसे गठबंधन तोड़कर अकेले लड़कर शक्ति प्रदर्शन तो कर सकते थे। लेकिन दिल्ली में उनके संगठन ने "पापा नहीं मानेंगे" बोलकर चुप रहना ठीक समझा।
उड़ीसा में शंख और फूल किसी बड़े प्रयोजन का लक्ष्य साध कर गठबंधन करने को सहमत हो गए थे। फिर अचानक असहमत होकर अपने अपने रास्ते चल दिए।
कार्यकर्ता छोड़िए विधायक और सांसद भी अपनी पार्टी के निर्णयों से सहमत नहीं दिखते और जब तब क्रॉस वोटिंग कर देते हैं। कुछ तो सुबह कहते हैं सब अफवाहें फैलाई जा रही हैं और शाम को अपने अपमान से आहत होकर या नेतृत्व द्वारा अनदेखी करने के कारण पलट जाते हैं। लगता तो ऐसा है कि अफवाहें भी स्वयं फैलाते हैं। पार्टी लाइन से असहमत नेताओं में कांग्रेस के आनंद शर्मा भी आ गए, कहने लगे वे पार्टी की जातिगत जनगणना की घोषणा से असहमत हैं। उनकी पार्टी ने इसी बात पर तो चुनाव लडने का मन बनाया हुआ है।
एक तरफ बैंगलोर से एक ऐसे व्यक्ति को टिकट दे दिया जाता है हो दक्षिण भारत को अलग देश बनाने की मांग करता है, दूसरी तरफ भारत जोड़ो यात्रा चल रही है। जब सबको जाति, धर्म, भाषा आदि के आधार पर अलग-अलग करना है तो क्या जोड़ने चल रही है? जाहिर है आप अपने प्रत्याशी के अलगाववादी विचारों से सहमत हैं।

विचार तो वैसे नेताओं के होते नहीं, केवल सुविधा और अवसर होते हैं। प्रचार के समय तो कुछ भी कर्ण प्रिय बोल सकते हैं। जनता भी इन के प्रचार करने वालों से पूछ सकती है, आप कौन हैं? पार्टी या ब्रोकर? फिलहाल इनका एक दूसरे के साथ मिलकर चुनाव लडना ब्लाइंड डेट की तरह है, मामला जमा तो ठीक नहीं तो एक दूसरे पर जबरदस्ती का आरोप लगा कर कोर्ट में घसीटते फिरेंगे। इनकी नीयत "फ्रेंड्स विथ बेनिफिट्स" वाली है। चुनाव नेताओं से जो न करवाए वो कम है। चुनाव लडने तक साथ दिखने वाले कब अलग दिशाओं में चल दें कौन जानता है?


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