विपक्ष के तमाम नेता सरकार बनाने की बात नहीं कर रहे हैं, बल्कि मोदी को हटाने की बात कर रहे हैं। इनको कौन समझाए कि भाई मोदी को हटाने से काम नहीं चलेगा, मोदी की जगह कौन लेगा यह भी तो बताओ। सरकार गिराना अलग बात है, सरकार बनाना और चलाना अलग बात है। जहाँ विपक्ष में आपस में इतनी सरफुटौव्वल है कि एक राज्य में साथ हैं दूसरे में विरोध में, तो ये मिलकर सरकार कैसे चलाएंगे? जबकि परिस्थित भी ऐसी है कि कांग्रेस अपने दम पर सौ सीटें लाने की बात सोच भी रही है या नहीं यह निश्चित नहीं है। फिर देश का नागरिक यह प्रश्न क्यों न पूछे कि भाई आपका नेता कौन है?
मोदी को गाली देने से वोट नहीं मिलेंगे, मोदी का विकल्प देने से मिलेंगे। आप अपना पक्ष रखिये। स्पष्ट कीजिये आपकी क्या नीयत और नीति है। अगर कोई नीति है तो पहले वहाँ लागू कीजिये जहाँ आपकी सरकार है।
लेकिन नहीं, आपने एक लाइन पकड़ रखी है - अडानी-अम्बानी को कोसना और मोदी पर व्यक्तिगत अभद्र टिपण्णी करना। मोदी इस मामले में बहुत किस्मतवाले कहे जाएंगे कि उनके प्रचार के लिए विपक्ष ही पंचलाइन दे देता है। चायवाला से लेकर मौत का सौदागर और चौकीदार ही चोर है तक कहना विपक्ष को भारी पड़ चुका है। इस बार परिवार को लेकर बेमतलब की बयानबाज़ी कर रहे हैं। कभी उनकी माँ को लेकर अभद्र टिपण्णी करते रहे हैं कभी पत्नी को लेकर जिनका राजनीति से कोई लेना देना नहीं है। ऊपर से परिवार को लेकर टिपण्णी कर कौन रहा है - लालू यादव। जो स्वयं घोटालों में दोषी पाए जाने के बाद भी घटिया न्यायव्यवस्था के कारण जेल से बहार हैं। वो लालू जिनको जब न्यायालय ने सजा दी तो अपनी अंगूठाछाप पत्नी को मुख्यमंत्री बना कर शासन चलाया। आप मोदीजी का विरोध कर रहे हैं या प्रचार? मोदी का परिवार न होने का अर्थ ये क्यों न निकाला जाए कि उनका कोई स्वार्थ नहीं है। उन्हें अपने पत्नी या बच्चों के लिए कुछ जोड़ने की आवश्यकता नहीं है। जो करेंगे देश के लिए निस्वार्थ करेंगे। वो जब देशवासियों को अपना परिवार कहते हैं तब देशवासी भी यही समझते हैं कि यह व्यक्ति खुद के लिए जोड़कर करेगा भी क्या?
आपके तो परिवार हैं। आपको अपने परिवार के लिए जोड़ना है। उन्हें राजनीति में फिट करना है। बेटों-बेटियों को मुख्यमंत्री बनाया जाए। आपके बाद आपकी पत्नी, और बच्चे उत्तराधिकारी हैं। आपकी राजनीति पर कब्जे के लिए आपके बच्चे लड़ेंगे। मोदी को चिंता करने की जरूरत नहीं है कि उनके बाद उनका कोई दूर का रिश्तेदार राजनीति में आएगा। आप लोगों की प्राथमिकता अपने परिवार के लिए धन संग्रह है। जिसके लिए आप जमानत पर हैं। जनता इसको कैसे देखेगी अगर थोड़ा दिमाग लगाएं तो समझ पाएंगे।
कुछ लोग लोकपाल और भ्रष्टाचार को मुद्दा बनाकर राजनीति में आए। लेकिन अब उन्ही भ्रष्टाचारियों के साथ खड़े होने को उतावले है। भ्रष्टाचारी ही भ्रष्टाचार बंद करो के पोस्टर लेकर खड़े दिखते हैं। इससे हास्यास्पद दृश्य कम ही देखने मिलता है।
एक नागरिक की तरह यह पूछना बनता है कि अगर वर्तमान सरकार कुछ गलत कर रही है तो आप क्या विकल्प उपलब्ध करवा रहे हैं। कुछ बुनियादी प्रश्न हैं।
आपका नेतृत्त्व कौन करेगा?
बिना नेतृत्त्व के मोदी के सामने आप खड़े नहीं हो सकते। मोदी के पास लम्बा अनुभव है और अपने आप को उन्होंने स्वयं को साबित किया है। इतने लम्बे राजनैतिक कैरियर के बाद भ्रष्टाचार का दाग नहीं। कठोर निर्णय लेकर कठिन परिस्थितयों में अपने नेतृत्त्व से देश को कई बार निकाला है। लॉकडाउन लगाकर देश को रोक देना और फिर अच्छी गति से चला देना किसी आम नेता के बस की बात नहीं है।
उनके सामने आप किसको खड़ा करना चाहते हैं। राहुल गांधी को स्वयं कांग्रेसी भी विकल्प नहीं देखते। बाकियों को छोड़िये वे स्वयं को प्रधानमंत्री पद का दावेदार नहीं बताते। बोलते समय परिपक्वता नहीं दिखते। दौड़ने, फुटबाल खेलने,खाना पकाने जैसे दृश्य से आपके कट्टर समर्थक आह-वाह तो करेंगे लेकिन किसी और को प्रभावित नहीं करते।
केजरीवाल स्वयं को मोदी के सामने रखने का प्रयास करते हैं लेकिन स्वयं ED के समन से ऐसे भागते फिर रहे हैं कि किसी भी समय जेल जा सकते हैं। उनके मंत्री पहले से जेल में हैं। उनकी छवि एक अर्बन-नक्सल की है। उनको विपक्ष के अन्य दल कभी स्वीकार नहीं करेंगे। दिल्ली वाले भले ही चुनते रहे हैं लेकिन मुफ्त-मुफ्त के अलावा उनका कोई और विज़न नहीं है। उनकी पार्टी ने उनको दिल्ली में मुसलमानों का मसीहा बता कर बड़े हिन्दू वर्ग को सदा के लिए उनसे दूर कर दिया है।
हिट एंड रन वाली बयानबाजी और भ्रष्टाचारियों के साथ खड़े रहने के कारण उनकी छवि "दिल्ली के पढ़े लिखे लालू" वाली ही है। उनको अपने चने जैसे आधे राज्य की आवश्यकताओं और पूर्ती का भी अंदाजा नहीं हो पाता। जो बात बात पर कहते नहीं इस बार नहीं हो पाया पाँच साल और दे दो हो जाएगा। हर समय केंद्र और अन्य राज्यों से टकराव की स्थिति बना कर रहना उन के पक्ष में नहीं जाता। वे लोगों को साथ लेकर नहीं चल सकते। इसका एक उदाहरण तो उनके साथी ही हैं, जिन्हें उन्होंने अपनी पार्टी से अलग सोच और विचार रखने के कारण निकाल दिया।
ममता बैनर्जी की छवि बंगाल के बाहर बेहद ख़राब है। नितीश कुमार वापस छिटक कर भाजपा के साथ आ गए। और कोई नेता स्वयं को बड़े मंच पर प्रस्तुत नहीं करता। मायावती को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित करने की अफवाह उड़ाई जा रही थी उन्होंने स्वयं खंडन कर दिया है।
कुल मिलाकर विपक्ष नेतृत्त्व विहीन है। नवीन पटनायक की छवि अच्छी है, वे विकल्प हो सकते थे लेकिन वे अपने राज्य में संतुष्ट दिखते हैं और केंद्र के साथ सहयोग की भूमिका में रहना चाहते हैं।
अमेठी में आपके समर्थक खून देंगे बदला लेने की बात करते हैं और जब प्रत्याशियों की सूची निकलती है तो आपके नेता का नाम वायनाड से घोषित कर दिया जाता है। अगर दो सीट से लड़ना ही था तो वायनाड बाद में घोषित करते, अमेठी की उम्मीदें जिन्दा रखते। कार्यकर्ताओं में जोश बना रहता। सोनिया गाँधी के राज्यसभा जाने से वैसे भी आपके कार्यकर्ताओं में सन्देश अच्छा नहीं गया होगा।
आप उसके सामने लड़ रहे हैं जिसने सांसद बनने के बाद अमेठी में पर्याप्त समय बिताया है। जनता से जुडी हैं। लेकिन उनके काम की आलोचना की जगह आप उनपर और उनके बच्चों पर अमर्यादित टिपण्णी करते हैं। आपको चुनाव में हरा दिया तो आप उनके और उनकी पुत्री विरुद्ध अपशब्द कहते हैं, तब आपका महिला सम्मान कहाँ जाता है?
नीति और नीयत
लोग किसी नेता में यह देखना चाहते हैं कि आप देश के विकास के लिए क्या करेंगे। जब आप आए दिन उद्योगपतियों के विरुद्ध कुछ न कुछ बोलते रहते हैं। मेड इन इंडिया, बुलेट ट्रैन, आत्मनिर्भर भारत जैसी महत्वाकांक्षी परियोजनाओं का उपहास करते हैं। देश की क्षमताओं पर प्रश्न करते हैं। कोरोना काल में देश में बनी वैक्सीन पर शंका करते हैं। विदेश से वैक्सीन मंगाने की वकालत करते हैं। बालाकोट-सर्जिकल स्ट्राइक पर प्रश्न उठा कर देश की सेना का मनोबल गिराने का प्रयास करते हैं। खालिस्तानियों के साथ खड़े दिखते हैं। मोदी का विरोध करते-करते देश का विरोध करने लगते हैं। मोदी का अपमान करते करते देश का अपमान करने लगते हैं। मोदी को वोट देने वाले को राक्षस कहते हैं। तब जनता आपको कैसे देखे?
आप ऐसे नकारात्मक लोगों के साथ दिखते हैं जो देश को बढ़ते नहीं देखना चाहते। रघुराम राजन जैसे भयंकर नकारात्मक व्यक्ति से आर्थिक सलाह ले रहे हैं जिनको देश के विकास की गति का कोई अंदाजा नहीं है।
विपक्ष को बताना चाहिए सड़क/परिवहन में नितिन गडकरी से बेहतर काम करने क्षमता रखने वाला कोई चेहरा आपके पास है? नागरिक उड्डयन मंत्रालय में सिंधिया से बेहतर व्यक्ति है? आप ही की पार्टी से निकल कर इस तरफ आए हैं। क्यों आने दिया?
अश्विन वैष्णव, निर्मला सीतारमण, अमित शाह सभी मंत्रियों का काम देखकर बताइये आपने पास इनके विकल्प कौन हैं? चिदंबरम? जो कहते थे देश में डिजिटल इंडिया संभव नहीं है? बिहार-बंगाल के वो नेता जो हर सरकार में रेलमंत्रालय के लिए लड़ते रहे हैं।
इन लोगों के काम में कमियाँ तो निकाली जा सकती हैं। विकल्प न दें तो वही कमियाँ उजागर करें। पर आप अपशब्दों पर अधिक ध्यान देते हैं। हास्यास्पद पंच के बीच में अपशब्दों की कडवाहट में मुख्य मुद्दे दब जाते है। रेलमंत्रालय की आलोचना आप यह कह के कर सकते हैं कि भीड़ अनियंत्रित है, होली पर भी होगी। लेकिन आप बुलेट ट्रेन, वन्दे भारत जैसी नई परियोजनाओं पर प्रश्न उठाते हैं। भीड़ पर घेरिये। बिना अपशब्दों के रेल के अंदर हो रही असुविधा पर घेरिये। जनता साथ देगी। नितिन गडकरी को बेहिसाब बढे हुए चालान पर घेरिये, टोल पर हो रही वसूली पर घेरिये साथ ही विकल्प भी बताइये कि आप कितना घटाएंगे। लेकिन आपके नेता ही अपने संसदीय क्षेत्र में बड़ी सड़कों से इतने प्रभावित हैं कि नितिन गडकरी के विरुद्ध बोलने से कतराते हैं।
नौकरियों की बात करते हैं, लेकिन सब सरकार आती है तो आपने नेता कहते हैं - हमने सरकारी नौकरी की बात नहीं की थी। फिर कोई कैसे विश्वास करे।
https://x.com/Ra_THORe/status/1755891618303922508?s=20
किसानों की बात करते हैं, MSP की बात करते हैं लेकिन रूप रेखा नहीं बताते। विपक्ष में रहते हुए तो सब तरह के दावे कर देते हैं। जैसे भगवंत मान पंजाब में सरकार बनाने के बाद राज्य सरकार द्वारा ही MSP देने का दावा कर रहे थे सरकार में आने के बाद पलट गए। अब केंद्र पर थोप रहे हैं।
https://x.com/MP_NavneetRana/status/1764989620272710116?s=20
वास्तविकता की बात कीजिये, वो कहिये जो संभव हो प्रचार के समय कह देना आसान है बाद में वचन पूरा करने में पसीने आ जाते हैं। कर्णाटक सरकार हो या पंजाब, जब अपनी चुनावी घोषणाओं की पूर्ती की बात आती है तो केंद्र पर थोप कर पल्ला झाड़ लेते हैं। या फिर किसी न किसी प्रकार मध्यम वर्ग का बोझ बढ़ा देते हैं। अडानी कितने में शर्ट खरीद रहा है या कौन कहाँ नाच रहा है, मनरेगा में कितने किस जाति के हैं यह सब वोट नहीं दिलाएगा। मुफ्त बिजली की बात करते हैं यह नहीं बताते बिजली कहाँ से आएगी। ऐसे में प्रधानमंत्री की सूर्योदय योजना स्पष्ट करती है कि बिजली कहाँ से आएगी। इस प्रकार के ब्लूप्रिंट सामने रखिये।
आपको यह स्पष्ट बताना होगा कि वर्तमान सरकार में कमी कहाँ है और आप कैसे दूर करेंगे। देश में एकता जैसे बनाए रखेंगे। आप संदेशखाली पर चुप रहकर कहीं और हो रहे अपराध पर नहीं बोल सकते। पिछले हफ्ते हुई प्रधानमंत्री की कश्मीर की सभा साबित करती है ३७० अब बीती हुई बात है, उससे आगे बढिये।
विमुद्रीकरण को आठ साल हो गए, उसके बाद केंद्र में मोदी चुनकर दोबारा आ चुके हैं। कई राज्य के चुनाव जीत चुके हैं। उससे बाहर निकलिये। श्री राम के विरुद्ध बोलना बंद कीजिये। राम नवमी चुनाव के बीच में पड़ेगी। उस दिन जब श्रीराम का भाल सूर्य की रौशनी से दमक उठेगा तो उनकी चकाचौंध में जलने वाले अंधे हो जाएंगे। विभिन्न वर्गों को लड़ कर ऊर्जा व्यर्थ करने की जगह मुख्यधारा में आने के लिए विकल्प दीजिये। UCC का विरोध की नहीं उसे बेहतर तरीके से लाने की बात होनी चाहिए। राजनीति में आप हैं, मुद्दे खोजिये।
फिर जब पत्रकार कहते हैं कि देश को मजबूत विपक्ष देना जनता की जिम्मेदारी है तब जनता यह प्रश्न क्यों नहीं पूछे कि देश के पास अभी जो मजबूत नेतृत्त्व है उसे हटा कर लाना किसे है? स्थिर होते देश में १९९० के दशक वाली अस्थिरता क्यों लाइ जाए। जनता क्यों करे? जनता ने ठेका लिया है विपक्ष का? विपक्ष ने विकल्प प्रस्तुत ही नहीं किया। जनता को विश्वास में लिया ही नहीं। सोशल मीडिया पर समर्थकों के अंट-शंट दावों को आपने जमीनी हकीकत मान लिया है। उनको उतना ही पता है जितना आपको अपने AC कमरों में बैठकर गर्मी के विषय में पता होता है।
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