शुक्रवार, 22 जून 2018

रीजक का धरना


हसीनापुर के मालिक रीजक जब से दक्षिण के मिलन समारोह से लौटे थे तब से बड़े परेशान थे । उन्होंने जितना सोचा था उसका एक प्रतिशत भी भाव उस सभा में उन्हें नहीं मिला था जिसकी उन्होंने कल्पना की थी । गए तो थे एक राज्य के मालिक की तरह किंतु वहां एक दर्शक बने एक कोने में बैठे रहे । ऊपर से चींवि ने उन्हें लताड़ सा दिया था और सूरमाओं तो की फोटो में उनके न सींग ही आये न पूँछ ।रीजक का मन पीड़ित हो रहा था, इतने बड़े बड़े उत्पात करने पर भी दो कौड़ी का भाव। ऊपर से हसीनापुर के लोगों ने मालिक से प्रश्न करना प्रारम्भ कर दिया था ।

मालिक स्वच्छ जल?
मालिक बिजली?
मालिक - बरसात के पहले की तैयारियाँ , सफाई?

ऊपर से लपिक ने रीजक का जीवन नर्क कर रखा था। रीजक रायता फैलाते और लपिक वही गोबर से लीप देते । दोनों का वाक् युद्ध रोचक होता जा रहा था । लपिक ने उनके हर भेद को खोल कर रख दिया । रीजक कहते हम सच्चे और लपिक कहते तुम लुच्चे । रीजक कहते भोले और लपिक उनके भालू रूप की तस्वीर दिखा देते । विवाद बढ़ता जाता ।

रीजक को उपाय सूझा । वही किया जाए जिसको करने में उन्हें महारथ प्राप्त है , उन्होंने अपने विश्वस्त सनीम को लपागो और रदनतिस को साथ लपेटने को कहा ।

सनीम यथा नाम नीम की चाशनी डूबा हुआ रसगुल्ला थे । उतने ही कर्तव्यपरायण जितने उनके सर पर बाल । चाहते थे सिंहासन लेकिन रीजक भी कम चीकट क थे, जिस कारण उनकी इच्छाएं अधूरी रह गयी थी ।
वे रीजक के बायें हाथ थे, और उनका कार्य वस्तुतः वही माना जाता था जो बाएं हाथ का होता है ।
सनीम के लपागो से चिढ़ने की वजह अलग ही थी । उन्हें लगता था जितने बाल उनके सर पर नहीं जितने लपागो अपने मुँह पर लगाये घुमते हैं  ।रीजक की वैसे तो अनेक राजनैतिक पत्नियां थीं, उनमे से एक वामा थे रदनतिस । रीजक को अपनी समस्त राजनैतिक पत्नियों में रदनतिस ही अत्यंत प्रिय थे ।

कलियुग में विशेषकर वामपंथ के लोग उदारवाद (लिबरल) में अत्यधिक उदार हो गए थे । पत्नी और पत्ना का भेद नहीं मानते थे । पुरुष पत्नी के साथ भी रहते और पत्ना के साथ भी, विवाह बंधन नहीं ।
रीजक के श्वेत-श्याम धन के समस्त रहस्य जानने वाले रदनतिस उन्हें अत्यंत प्रिय थे, यहाँ तक की गबन के अनेक आरोपों से घिरे रहने पर भी सच्चे जीवनसाथी की तरह रीजक ने रदनतिस का साथ नहीं छोड़ा था ।
शायद कोई और भेद खुलने का भय रहा हो ।
किन्तु अभी स्थिति यही थी कि चारों ने अपनी चौकड़ी बना ली थी और मंत्रणा कर रहे थे ।

रीजक ने कहा - हमारा तो कोई मान ही नहीं रह गया है । उधर मिलन समारोह में हमें बड़ा बदनाम किया गया । इधर हसीनापुर के लोग और लपिक प्रश्न करते है ।
कभी कोई पानी मांगता है कभी बिजली ।कहाँ तक उत्तर दें। अभी अभी छुट्टियां बिता कर आये हैं , तो दोबारा जा भी नहीं सकते ।
इसलिए सबका ध्यान भटकाने और अपने आप को पुनः स्थापित करने हेतु हम वही करेंगे, जिसमे हम सिद्ध हस्त हैं।हम धरना देंगे ।
स्वभाव से कोमल रदनतिस ने कहा-बाहर गर्मी है ,कहाँ धरेंगे और क्या धरेंगे?
हम तो सूख जायेंगे । ऊपर से हमारे व्यक्तिगत कोष की स्थिति ठीक नहीं है कि बाहर मजमा लगा सकें । फिर आपने ही तो हमारे भीड़ जुटाने वाले कविराज रमाकु को बहार फिकवा दिया ।
आप जानते हैं हमारे पक्ष में जितनी भीड़ जुड़ती थी उसमे आधे से ज्यादा तो कवि को सुनने के लिए आते थे,आपका ड्रामा उसके बाद आता था।अब वो आपको और आपकी नीतियों को खुलकर लताड़ रहे हैं।अबके अगर किसी मैदान में भीड़ का आह्वान किया तो निश्चित है खर्च होगा बहुत लेकिन भीड़ नहीं जुटेगी।
माने न माने कविराज इस वामाओं के दल में एक मात्र राष्ट्रवादी थे । और हम सब के बीच से राष्ट्रवाद की कवितायेँ सुनकर बहुतो को हमसे जोड़ देते थे । लपागो ने कहा इसीलिए तो निकाला । हम वामियों के बीच कैसा राष्ट्रप्रेम और कैसा राष्ट्रप्रेमी? या तो हमसे प्रेम कर ले या राष्ट्र से ।
जहाँ वाम है वहां कोहराम रह सकता है राम नहीं । और वह तो खुद को राम का वंशज कहता था ।
रदनतिस ने कहा अब जो है सो है लेकिन हमसे गर्मी और धूप में न होगा । फिर हम धरना करेंगे किस बात पर ? राज तो हमारा ही है ।रीजक ने कहा -आज तक किस बात पर दिया है? तो फिर हम लालजी के घर में धरना देंगे, वातानुकूलित वातावरण में आराम से बैठेंगे । धरने का धरना आराम का आराम । न कोई कुछ पूछेगा न हम कुछ बताएँगे । हम लालजी के घर में बैठकर लालजी को हटाने और हसीनापुर को आज़ादी दिलवाने की मांग करेंगे ।
बाकी लोगों का ध्यान बंट जायेगा ।
सनीम ने कहा कब तक धरना है लालजी के घर पर?कम से कम ईद को तो बहार आना ही पड़ेगा ।वरना हमारे वोटर बिदक जायेंगे।वे नाराज़ बहुत जल्दी होते हैं । रीजक ने कहा देखते हैं और सभी ने हामी भरी और लालजी के घर पर जाकर चारों ने एक एक आसन पकड़ा और पसर गए ।
लालजी भी सोच कर बैठ गए बैठने दो , मिलना ही नहीं है । जब पसरे पसरे चार दिन हो गए और लालजी ने भाव नहीं दिया तो मन में उकताहट होने लगी ।
चारों ने शोर मचाया हम अनशन पर हैं। भूख से मर रहे हैं । चिकित्सकों का दल बुलवाया गया ।
जहाँ चार दिन के अनशन से जहां किसी का बुरा हाल हो जाना था, वहीं रदनतिस का वजन सवा किलो बढ़ गया था । लोग सोच रहे थे , कि भूखे रह कर भी आखिर ऐसी कौन सी हवा है जो वजन बढ़ा गयी ।
अंदर बैठे बैठे चारों बाहर निकलने के लिए तड़प रहे थे और लालजी ने इनको बिठा कर इनको लाल करने की ठान ली थी ।
रीजक ने आखिर जम्बूद्वीप के सम्राट के अन्य विरोधी क्षत्रपों को बुलावा भेजा और चार क्षत्रप अपना विरोध धर्म निभाने हसीनापुर की ओर कूच कर गए । हसीनापुर के लोगों के लिए भरपूर मनोरंजन अभी पंक्तिबद्ध था ।
क्षत्रप हसीनापुर पहुँच  गए किन्तु रीजक से मिल नही पाए। लालजी के सिपाहियों ने उन्हे बाहर ही रोक दिया, रीजक और क्षत्रप मन-मसोस कर रह गये। किन्तु रीजक को आत्मसंतुष्टि हो  गयी। सम्राट को अपशब्द कहते कहते रीजक की जिह्वा न थकती थी न रुकती थी। इधर रीजक से कुपित हो लपिक ने उनके ही दरबार मे डेरा डाल दिया और धरने पर बैठ गये। धरने के विरोध मे कोई धरने पर बैठा हो और हर नागरिक खुद  मालिक को धरने के लिए लालायित हो ऐसा गज़ब संयोग हुआ।  हसीनापुर जैसे धरनास्थल हो और धरना ही यहाँ के शासकों की धारणा। 
जब अपनी तशरीफ़ धरे धरे कोमलांगी रतिंदस थक गये और उनसे सहन न हुआ तो पहले वे ही निकले, पीछे से सनीम और अंत मे रीजक की नवरात्रि समाप्त हुई और मेघनाद के पुतले की तरह रीजक दशहरे के दिन बाहर निकल आए। रीजक को किसी ने भी भाव न दिया था, किंतु फिर से वे ऐसे ढोल बजाते हुए बाहर आए जैसे बस अभी अभी युद्ध मे से प्राण बचाकर आए हों। मिला उन्हे कुछ न था, लेकिन थकान बहुत हो गयी थी।  इसलिए सब अपनी अपनी औकात अनुसार अलग  अलग स्थानों पर अवकाश पर चले गये।  और हसीनापुर वासी, बस इसी धरना और अवकाश के बीच मे अपने आप को चटनी में पिसती धनिया समझते रह गये।  

2 टिप्‍पणियां:

  1. सुंदर अति उत्तम व्यंग लेखन वापस जीवित होना हिंदी साहित्य जगत के लिए वरदान है।

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