शनिवार, 17 नवंबर 2018

बुद्धिजीवियों का आतंक


बुद्धिजीवियों का आतंक बहुत है । ये अखबारों में छपते हैं ,किताबों में बिकते हैं, मंचों पर दिखते हैं ,अनर्गल बकते हैं और लोगों के सर में फोड़े जैसे दुखते हैं । उन्होंने स्वयं को दाएँ से बाएँ और बाएँ से दाएँ तक फैला दिया है। 
हर बुद्धिजीवी को लगता है वह आसमान में उड़ता हुआ गिद्ध है,और उसे ऊपर से सबकुछ दिख रहा है। लेकिन हैं तो गिद्ध ही, फिर वह अपना स्वभाव कैसे त्याग सकता है, अतः बुद्धिजीवी अवसर देखकर टूट पड़ने को सदैव आतुर रहते है। 

बुद्धिजीवी हैं तो सोचना और विचार करना इनकी आत्मा में समाया हुआ है , और इसी सोचने और विचार करने में विचारधाराओं से जुड़ जाना स्वाभाविक है। और इसी के चलते बुद्धिजीवी मूलतः दाएं और बाएं वाले हो गए हैं । 

जो दाएं वाले हैं बड़ी दुविधा में पड़े रहते हैं उनकी समस्या उनके ही नेताओं की हरकते हैं, जिनका समर्थन ये करते हैं । जितना आदर्शवादी दायीं तरफ के नेताओं को होना चाहिए उतने रह नहीं गए हैं। दरसल यह नागपुर के संतरों के बीच मौसमी, नीम्बू और खटुआ जैसों का संतरा बनकर बैठ जाने का नतीजा है। अंततः होता यह है कि दाएं वाले बुद्धिजीवी कलम के सिपाही बनकर जो विचार व्यक्त करते हैं उसे कमल का सिपाही समझ लिया जाता है। बड़ी महीन झिल्ली है कलम का सिपाही और कमल के सिपाही हो जाने में, लेकिन दाएं वाले अपनी विचारधारा के समर्थन में अगर कुछ भी कहते सुनते हैं तो वह भक्ति गीत ही कहलाता है , ऐसा बाएं वाले बुद्धिजीवियों का मत हैं।  

उनका मत तो यह भी है कि जो कुछ सत्ता के विरोध में कहा जायेगा केवल वही व्यंग्य कहलाने का अधिकार रखता है अन्यथा नहीं । तो जो वामपंथ वाले कहते और करते हैं वह क्रन्तिकारी विचार माना जाना चाहिए और जो दायीं तरफ वाले कहते और करते हैं उसे आप चरणवंदना या भक्ति गान या दलगत आस्था की श्रेणी में रख सकते हैं।  

जो बाएं वाले  है, इनका वर्चस्व ऐसा फैला हुआ है कि कोई इनकी बात को काट दे तो अपराध गंभीर ही माना जाता है, अपितु इनके छू करने मात्र से ट्विटर के मठाधीश किसी का भी खाता बंद कर सकते हैं । 

तथाकथित बाएं वाले बुद्धिजीवी वामपंथ पर चलते हुए बहुत आगे निकल गए और उन्होंने अपने आप को भी बाएँ से दाएँ तक फैला दिया। इनका वर्चस्व ऐसा फैला कि पत्रकार, चित्रकार, कलाकार बनकर व्यभिचार भी करते तो समाचार न बनता । 
न्यायाधीश, सत्ताधीश, मठाधीश बनकर अनाचार भी करते तो भी इनके विरोध का कोई आधार न बनता । यही नेता अभिनेता छात्र बनकर लोगों को मूर्ख बनाते घूमते और लोग आखों पर पट्टी बाँधे हुए हाय हुक्कु हाय हुक्कु करते हुए इनके पीछे चल पड़ते।  

राजशाहों के राज में पहले बुद्धिजीवी सत्ता का अंग बने, फिर सत्ता का रंग बने और तीसरी पीढ़ी तक सत्ता का ढंग बन गए । एक प्रकार से स्वयं ही सत्ता, स्वयं ही सत्ताधारी हो गए । इनका अपना गुट बना और केवल अपने गुट द्वारा , गुट के स्वार्थ के लिए शासन ही इनका उद्देश्य रह गया । 

एक समय अखबारों पर कब्ज़ा जमा चुके बुद्धिजीवी कॉफी हाउस से पब और कब पब से बार में पहुंच कर गंभीर चर्चा से दारु का खर्चा पर बहस करते और हिन्दू हिंदी हिन्दुस्तान को गाली देते हुए बेशर्मी के ठहाके लगाते । 
दरसल एक भारत की परिकल्पना से कांप उठने वाले ब्रेनवाश्ड बुद्धिजीवी, उसी परम्परा से उपजे हैं जिस परंपरा ने संयुक्त हिन्दू परिवारों में 'छोटा परिवार सुखी परिवार' के नारे का नींबू मिर्च डालते हुए पहले घर में ज्यादा बच्चों को समस्या बताया और फिर पश्चिम की हवा ने माता पिता को ही बोझ बना दिया और अंततः परिवार छोटा करने के नाम पर माता पिता को ही परिवार से अलग कर दिया। 

कुल मिला कर एक रहना इनके स्वाभाव मे ही नही है, असली ब्रेनवाश्ड बुद्धिजीवी वह है जो गर्व से सर उठा के कह सके कि जो कुछ माता पिता ने हमारे लिए किया है वा उनका कर्तव्य था, अपने कर्तव्यपालन के अलावा उन्होने हमारे लिए किया क्या हैं और यह कहते हुए अपने माता पिता को दुत्कार दे। 

इसी प्रकार के बुद्धिजीवी मातृभूमि को भूमि मात्र समझकर टुकड़े टुकड़े का राग अलापते हैं। 

जो बाएं वाले लिबरल बुद्धिजीवी हैं, वे कब वामपंथ पर चलते चलते कामपन्थ पर निकल जाते हैं उन्हें खुद आभास नहीं होता। चाहे तो दिल्ली का हस्ताक्षर देख लीजिये । जो वामपंथ के लिबरल बुद्धिजीवी सारे देश में करना चाहते हैं उसका नमूना दिल्ली की शान बताये गए सिग्नेचर ब्रिज पर देखने को मिला है।   

ऐसा नहीं है कि बुद्धिजीवी केवल दाएं और बाएं वाले है, एक बुद्धिजीवियों का एक नियो वर्ग भी देखा गया है, जिसे देश से तो प्रेम है लेकिन किसी और के विचारों की अभिव्यक्ति इनको पसंद नही आती। 
ये वैसे तो कतई नही है जैसे की पुराने वाले बुद्धिजीवी है लेकिन इनका मामला अलग ही तर्क पर चल रहा है। ये लेफ्ट वाली हवा खाते हुए राइट वालों पर फूंकते हैं । ये कुछ अत्यधिक पढ़े लिखे बुद्धिजीवी हैं, और तर्क के अर्क के अलावा कुछ और नहीं पीते । 

लेकिन राईट लेफ्ट करते हुए अपने को निष्पक्ष कहते हैं और सामने वाले आदमी को कोसने का अधिकार समझते हैं ।  इनकी अपनी हाहाकार सेना है । जो किसी भी बात पर कभी भी कैसे भी किसी के खिलाफ भी हाहाकार मचा सकती है ।

हाहाकार सेना को त्यौहार में भी राजनीति दिखती है और राजनीति में भी त्यौहार । इनके हिसाब से अगर कोई उसका समर्थक है जिसके वो विरोधी हैं तो वह घोर चाटुकार है और अगर कोई उसका विरोधी है जिसके वो समर्थक हैं तो वह घोर पक्षपाती है।  

दरअसल हाहाकार सेना को आशा के सन्देश का इंतज़ार है जो उन्हें मिल नहीं रहा ,और फिर खुद की निराशा को दूसरों पर लच्छेदार बातों में लपेटकर दूसरों पर थोपना इनको अच्छी तरह से आता है ।
हाहाकार सेना के सेनापति के अनुसार छाछ न दही जो वो कहें बात बस वही सही । इसलिए जो सही है वो छी छी है, और जो सही नही है वो तो सही हो ही कैसे सकता है । 
हाहाकार सेना का आधार ही विरोध पर टिका है और ये किसी भी बात का कभी भी कैसे भी विरोध कर सकते हैं ,क्योंकि विरोध करना ही है। हाहाकार सेना के हिसाब से आदमी को हर बात पर हाहाकार करना ही चाहिए क्योंकि सकारात्मक तो कुछ हो ही नहीं सकता, इन्हे नकारात्मकता हर जगह, हर आदमी में दिख सकती है।  
इनकी अपेक्षा सौ प्रतिशत है , जो बच्चा सौ प्रतिशत नहीं ला सकता है वह जीकर क्या करेगा । हालाँकि बहुत तगडी प्रतियोगिता का दौर है सो गलत तो नहीं है।

आमतौर पर हर बुद्धिजीवी के रंग ढंग निराले हैं। बुद्धिजीवी पहले आवाज़ और शब्दों में चाशनी घोलते हुए ऐसे बातें करते हैं जैसे इनसे बड़ा ज्ञानी और मृदुभाषी कोई है ही नहीं । सामने वाले को अपनी भाषा में उलझाते हुए ये श्रेष्ठ होने का प्रमाण देते हैं । 
कोई भाषा में न फंसे तब मुल्ला नसरुद्दीन वाले तर्क और मुल्ला अजहरुद्दीन वाले आंकडों से सामने वाले को चुप कराते हैं और अगर फिर भी बात न बने तो पहले तो अपनी तारीफ में बाईस सौ किस्से सुनाते हुए सामने वाले को नीचा दिखाते हैं, और फिर भी बात न बने तो रिश्तेदारी निकालने लगते हैं ।
जब रिश्तेदारी करीबी हो जाती है और अहसास होता है कि अब मामला बिगड़ गया है तो चुपचाप निकल लेते हैं।

तर्क कम पड़ने या ग़लत साबित होने पर भाषा की मर्यादा का नाप लेते हैं , फिर उसी नाप के अनुसार मर्यादा के ऊपर से, उससे बड़ी वाली छलाँग लगाते हैं।  
भाषा की मर्यादा की दुहाई देकर किसी के तर्क को नकार देना इनका गुप्त हथियार ही है।  
जब ये किसी को कमलगट्टा, भक्त , चाटुकार, चड्डी छाप, हिंदी मीडियम आदि कहते हुए उपहास करते हैं तो इसे भाषा की शालीनता मान लेने मे ही भलाई है है।  ये उनके हिसाब से शालीन भाषा में दिया गया आशीर्वाद ही है। 
प्रत्युत्तर में किसी को अपिया, पिद्दी आदि कह देना घोर अपराध माना जाता है। बुद्धिजीवी को उत्तर देने वाला जाहिल गँवार,असभ्य और अमर्यादित कहा जा सकता है।   

बुद्धिजीवियों की कमी नहीं थी, लेकिन कुछ लोगों ने बुद्धिजीवी बन जाना इसलिए स्वीकार किया कि फोन में ट्विटर था और दिन का एक जीबी था।  इन्हे एक जीबी वाला बुद्धिजीवी कहा जा सकता हैं। ये एक जीबी वाले ही हैं जिन्होंने भाषा का आतंक मचाया हुआ है। अगर दाएं और बाएं वाले आपस में (क्षद्म) सभ्यता से बात कर भी रहे हों तो ये अपनी १०२४ गज लम्बी उँगलियों से (दिमाग और जबान से तो ऐसे शब्द कहे भी नहीं जा सकते ) ऐसा कुछ लिख देते हैं कि मामला कहीं से कहीं पहुँच जाता हैं।

जब से सोशल मीडिया आया है, उसने बुद्धिजीवियों की कलई खोलकर रख दी है।  धीरे धीरे लोगों को यह समझ आने लगा कि ये जो बुद्धिजीवी हैं वही देश को असली चूना लगाने वाले पुतइये हैं। जो अपने मालिकों के काले कारनामो को तरह तरह के चूने से पोत कर सफ़ेद करते रहे हैं।  
जब तक बुद्धिजीवियों की बुद्धि मे यह बात आती तब तक उनके अख़बार समोसे रखने के और टीवी बिग बॉस आदि की भेंट चढ़ चुका था। 
टीवी पर खुद को सेलिब्रिटी या फिर यूँ कहिये "कभी कभी अपुन को लगता है अपुन ही देश की सरकार  है" समझने वाले न्यूज़ का जूस निकालते फिर रहे हैं।  
हालाँकि उन्होंने हमेशा से न्यूज़ का जूस ही निकाला है और अपने मालिकों के लिए प्रयोग किया है, जनता को हमेशा से न्यूज़ का छिलका देखने ही मिला है , न्यूज़ का गूदा तो कभी दिखाया ही नहीं गया ।
इसीलिए तो कभी अखबारों में चाव से पढ़े जाने वाले बड़े बड़े नाम तारों पर झूलते हुए पांच रुपया -सात रुपया मांगते फिर रहे हैं।

लेकिन अब जब जागे तो बुद्धिजीवियों ने सोशल मीडीया पर भी कब्जा जमाना शुरू कर दिया, ऐसा नहीं कि ये यहाँ ज्यादा प्रभावी हो गए हों, लेकिन अपने प्रभाव और अलग अलग जगह बैठाये हुए प्यादों के दम पर एक क्षद्म दमनकारी युद्ध छेड़ कर दूसरे विचारों का दमन करना प्रारम्भ कर दिया गया  है । 

अब सोशल मीडिया भी उन्हीं बुद्धिजीवियों के पाचनतंत्र का अंतिम छोर बनकर रह गया है और बुद्धिजीवियों की नयी प्रयोगशाला के रूप में स्थापित होने लगा है।  


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