शुक्रवार, 4 सितंबर 2020

ये पत्रकार होते कौन हैं?

हमारे मन में प्रश्न उठा कि ये पत्रकार होते कौन हैं? पत्रकार शब्द की परिभाषा क्या है? तरह तरह की परिभाषाएं सामने आ गईं। एक परिभाषा ठीक लगी - प्रकाशन, सम्पादन, लेखन अथवा प्रसारण सहित समाचार माध्यम के संचालन के व्यवसाय को पत्रकारिता कहते हैं। चिरईबुद्धि को समझ आया कुल मिलाकर खबरों का धंधा करने वाला ही पत्रकार होता है।

यहाँ कई तरह के पत्रकार उत्पन्न हुए हैं, कुछ खबरचंद हैं, कुछ रबरचंद, कुछ मुहरचंद हैं, कुछ लचरचंद। खबरचंद के पास वास्तव में कुछ खबरें भी हो सकती हैं, अन्यथा वे किसी भी मूली-मामूली बात को भी खबर बनाने में सिद्धहस्त होते हैं। 

रबरचंद वो पत्रकार हैं जो एक ही खबर को रबर की तरह तब तक खींचते रहते हैं, जब तक खबर का रेशा रेशा अलग न हो जाए। पत्रकार वही जो खबर की रबर बना दे, दो कदम आगे चले और आगे की घटना का अनुमान लगाकर खबर बना दे। फिर किसी जीते जागते आदमी को मार देना कौन सी बड़ी बात है।  

मुहरचंद वो पत्रकार हैं जो हर खबर या खबर की पूंछ पर जब तक कोई टिप्पणी करके अपनी मुहर न लगा दें, उसे खबर नही मानते।

कुछ होते हैं लचरचंद, ये इतने लचर होते हैं कि वास्तविकता के धरातल को अपनी बालकनी से भी नहीं झाँकते। जिन्हें वास्तविकता से कुछ लेना देना नही होता, वातानुकूलित कमरों में सोते हुए अचानक समाचार इनके मन में उत्पन्न होते हैं।

कुछ होते हैं थपड़चंद ये खबरों के चक्कर में यहाँ वहाँ थप्पड़ खाते घूमते रहते हैं। थप्पड़ खाने वाले पत्रकार बहुत प्रसिद्ध होते हैं। किंतु अनादिकाल तक सुख भोगने के पश्चात भी दुर्गति को प्राप्त होते हैं।

पत्रकारों के लिए पहुँच बड़ी चीज़ है। कहते हैं जहाँ न पहुँचे रवि वहाँ पहुँचे  कवि, लेकिन जहाँ न पहुँचे  कवि का विचार वहाँ पहुँचते हैं पत्रकार। लोग तो यहाँ तक कहते हैं कि पत्रकार नेताओं की पार्टियों, खाने की टेबलों से लेकर बैडरूम और बाथरूम तक में पहुँच रखते हैं।  पत्रकारों ने इसी पहुँच के बल पर बहुत कुछ कमाया। कुछ ने पद, पैसा, फ्लैट कमाए तो किसी ने जीवन ही सेट कर लिया और किसी ने बोतलों, समोसों से भी काम चला लिया। लेकिन हर पत्रकार का ऐसा भाग्य नही होता, एक पत्रकार हाल ही में खबर ढूंढने एक व्यक्ति के घर पहुँच गया, हालांकि वह दरवाज़ा तोड़ भी सकता था किन्तु उसका बड़प्पन था कि उसनें दरवाज़ा खटखटाया। जैसे ही दरवाज़ा खोला गया, पत्रकार ने माइक दरवाज़ा खोलने वाले के मुँह में ठूंस दिया। - बताओ तुम्हारा बेटा गिरफ्तार हुआ है तुमको कैसा लग रहा है।  पत्रकार को संभवतः अपेक्षा हो कि सामने वाला कहेगा - हमारा तो बचपन से सपना था कि हमारा बेटा ड्रग्स वगैरह बेचे, गिरफ्तार हो। हमारा तो दिल एकदम बाग़ बाग़ हो गया है। सामने से पहलवान निकलने की उम्मीद उसे नहीं होगी, जिसने पत्रकार की जमकर पूजा कर दी। पत्रकार नें दान दक्षिणा में पसेरी भर गालियाँ और कुंटल भर धक्के खाकर स्वयं को आशुतोषित कर लिया। क्या करें मजबूरी है। आजकल धंधे में कॉम्पिटिशन भी ज़्यादा है, मार्जिन भी कम है। उपर से सोशल मीडिया ने खबरों में मिलावट का धंधा चौपट कर दिया है। अब पत्रकारों को खबरों के लिए अतिरिक्त श्रम करना पड़ता है। 

पत्रकार वार्ता में शालीनता से प्रश्न करने वाले पत्रकारों का दौर निकल गया और गाड़ियों के पीछे माइक लेकर भागते पत्रकारों का समय भी जाता रहा। अब महिला पत्रकार भी बसों के टायरों पर चढ़कर बस की खिड़की में से नेताओं के बयान लेने लगी हैं और नेता भी बस की ख़िड़ियों से मुँह बाहर निकाल कर बयान उगलने में स्वयं को धन्य समझते हैं। लोगों के हलक में माइक डालकर बयान निकलवाने का कालखंड है। किंतु आज भी वास्तविक पत्रकार वही है जो लोगों के मुँह में माइक के साथ शब्द भी रखने में सिद्धहस्त हैं। पत्रकारों के साथ बयानवीरों की भी भीड़ बढ़ गयी है, उसका कारण है दिन भर समाचार चलाने के लिए कच्चे माल की आवश्यकता।

पहले समाचार भी अख़बार में सुबह आते थे, फिर रेडियो पर दो-चार बार आते थे, फिर दूरदर्शन पर दिन में तीन बार दवाई तरह आते थे। उसके बाद फास्ट फुड की तरह उपलब्ध, चौबीस घंटा समाचार का दौर आया और अब प्रति घंटा समाचार का दौर है।

टीवी पर जो बिग बॉस नही देखते वो समाचार चैनलों का कुकुरहाव देखकर प्रसन्न हो लेते हैं। देखना होगा पत्रकारों की पत्रकारिता एक टीवी पर पचास फ्रेम में चलते कुकुरहाव में कब तक सीमित रहती है। मीडिया भोंडी तो थी ही, गोदी मीडिया और लोभी मीडिया में बँटते ही पत्रकार एक दूसरे के खून के भी प्यासे हो गए। पत्रकार सार्वजानिक मंचों पर  आपस में भिड गए। 

एक पत्रकार ने दूसरे से कहा -"जिहादी", दूसरे ने कहा "तिहाड़ी।"

"तू गोदी मीडिया।"

"तू लोभी मीडिया।"

"तू चाटुकार।"

"तू पत्तलकार।"

"तू ट्रोल"

"तू आईटी सेल का पेरोल।"

"तू पिद्दी।"

"तू भक्त।"

"तू तू।"

"तू थू।"

एक ने कहा तुझे यू.पी. पुलिस उठा ले जाएगी, दूसरे ने कहा तुझे महाराष्ट्र की यू.पी.ए. पुलिस उठा ले जाएगी। और हुआ यह कि एक दिन एक पत्रकार को सच में पुलिस उठाकर ले गई। सभी पत्रकार ऐसे प्रसन्न हुए जैसे किसी की लड़की के भाग जाने पर मोहल्ले की औरतें अंदर ही अंदर खुश होती हैं। लेकिन खुलकर हँस नही सकतीं। एक दो को दुःख भी हुआ, एक दो ने तो सहानुभूति भी दिखाई। कुछ ने अपने मन के दांत निपोरते हुए दुःख व्यक्त करते हुए औपचारिकता के चार शब्द कहे। कुढ़े तो थे ही, पचास को इकठ्ठा बिठाता है और बोलने किसी को देता नहीं। बच्चू आज चढ़ा है पुलिस के हत्थे,अब पता चलेगा।  इस पत्रकार ने गिल्ड के नियमों को तोड़ दिया था। इसलिए परिणाम तो भुगतना ही था। 

गिल्ड वो गिलगिली-चिपचिपी संस्था है, जिसने पत्रकारों को निष्पक्ष नही होने दिया। गिल्ड अपने आप को पत्रकारिता का माईबाप समझती है। गिल्ड के कुछ अघोषित नियम हैं, प्रश्न किससे पूछने हैं किससे नहीं। किससे समोसे के स्वाद के विषय में पूछना है और किससे गोबर की खाद के विषय में। कई बार तो उत्तर देने वाले के गोबर को भी खाद बनाकर प्रस्तुत करने का भी विधान गिल्ड के नियमों में है।

गिल्ड के गुलगुलों के लिए तो अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता महत्त्वपूर्ण होती है, बाकियों को संभलकर बोलना चाहिए ऐसा विधान है। सभी पत्रकार गिल्ड के गुल नहीं होते और जो गिल्ड का गुल नही होते वो मर भी जाएँ तो गिल्ड के मुँह से उफ़ भी नही निकलती। दूसरी तरफ कुछ पत्रकार विशेष होते हैं, जिनकी मूंछ का एक बाल भी ज्यादा कट जाए तो राष्ट्रीय आपदा घोषित हो जाती है। 

कुछ सालों पहले तक तो पत्रकार बेलगाम घोड़े थे, जैसे दौडाते वैसे सरकार दौड़ती रहती। देश में खबरें, नैरेटिव, एजेंडा और यहाँ तक कि मंत्रालय भी कुछ पत्रकार ही तय करते थे। कुछ दरबार के ख़ास होते, तो कुछ अपने आप में दरबार होते थे। फिर एक दिन देश आगे बढ़ चला लेकिन पत्रकारों को साथ में लेकर नहीं चला, पत्रकार मुफ्त में चलना चाहते थे और देश को लगा चलना है तो अपने पैसे पर चलो। पत्रकारों का बोझ देश ने ढोना छोड़ दिया तो उन्हें मालूम चला कि वो कितने मुटा गए हैं। अपना पैसा खर्च करने की आदत तो थी नहीं तो बोझ महसूस होने लगा। खर्च चलाने के लिए एक पत्रकार बॉक्सर बन गए और बॉक्सिंग चैम्पियन के नाम से विख्यात हुए। दो चार पीड़ित तो ऐसे बेरोजगार हुए कि उन्हें कोई काम मिलना ही बंद हो गया। कुछ ने तार बिछा दिए, कुछ ने जाल। कुछ विदेशी पिताओं के लिए कहानियां लिखने लगे। कुछ मोजो जोजो बनकर दंगाइयों में शीरो और हीरो ढूँढने में लग गए। कुल मिला कर इन सब का जीवन बहुत कुछ झींगुर सा हो गया। जनता ने भी जब देखा कि जिन्होंने स्वयं को बुद्धिजीवी घोषित कर रखा था वो परजीवी साबित हो चुके हैं तो पत्रकार जगह जगह से दुत्कारे जाने लगे।

सभी नकाब उतर जाने के बाद जब पत्रकारों को समझ आ गया कि अब निष्पक्षता के बुर्के में छुपकर रहने में कोई फायदा नहीं है, तो सब खुलकर सामने आ गए। जो जिसके पक्ष में था, पक्ष में दिखने लगा, लिखने लगा। हर लेख से समझ आने लगा कि लिखने वाला किसके पे-रोल पर है। सरकार की आलोचना तो होती ही थी, होती है और होती रहेगी लेकिन नकाब हटने के बाद आलोचना गाली गलौच में बदल चुकी है। टीवी की बहस में भद्द पीटने पिटवाने से बोर हो चुके पैनलिस्ट गद्य और पद्य में गाली-गलौच की हद्द कब लांघ गए पता ही नहीं चला। कुछ दिनों पहले टीवी पर किसी कार्यक्रम में जनरल साहब भड़क गए थे। उसके बाद किसी की मध्यमा फड़क उठी और फिर लाइव रिपोर्टिंग करते करते टीवी पर अतिउत्साह में अपशब्द बोलते हुए नए आयाम स्थापित किए गए। 

पत्रकार दो गुटों में बँट चुके हैं, एक गुट सरकार का समर्थक और दूसरा विरोधी। झूठ की दुकाने खुल गयीं, पता सार्वजनिक रूप से उपलब्ध है। जिसे टीआरपी की अंधी दौड़ कह सकते हैं।  सब अपने आप में नंबर एक हैं।  मछली बाजार की तरह दर्शकों को अपनी तरफ खींचने में लग गए हैं। हमारी वाली खबर ताज़ी है, फलाने की बासी है।  हमारी खबर में काँटा नहीं है, फलाने की खबरों में हड्डी है।  

एक ने कहा टीवी मत देखो, किसी और को मत सुनो केवल मुझे सुनो क्योंकि हमने प्राइम टाइम का ठेका ले रखा है बाकी सब झूठे हैं। उनके समर्थक भी ऐसे निकले कि कोई और अपनी बात कहता तो उसे धुनक देते। खुलकर धरना प्रदर्शनों का संचालन करने वाले पत्रकारों ने हीरो भी बनाए शीरो भी। नेताओं का खुलकर चुनाव प्रचार करते हुए प्राइम टाइम पत्रकार कहते मीडिया नेताओं की गुलाम हो गई है, निष्पक्ष नही रही और स्वयं चुनाव प्रचार में अपनी वामपंथी विचारधारा के लिए वोट माँगते फिरते। 

चुनाव परिणाम अपने प्रिय दल के पक्ष में आने से प्रसन्नता हर पत्रकार के चेहरे पर दिख जाती है लेकिन चुनाव परिणाम पक्ष ने आने पर एक पत्रकार का तो नाच ही निकल गया।  ये वही पत्रकार हैं जो अपने कपटपूर्ण व्यवहार के लिए हर किसी से दुत्कारे जाते हैं। इनके अंदर कड़वाहट और नफ़रत इतनी अधिक है कि कोई व्यक्ति अगर बीमार पड़ जाए तो ये शोक संदेश देने लगते हैं और अगर किसी की मृत्यु हो जाए तो सार्वजनिक मंच पर दाँत निकाल कर अपनी प्रसन्नता दिखाते हैं। वास्तव में पत्रकार किस स्तर का गिद्ध हो सकता है ये उसके आदर्श हैं, और ऐसे आदर्शों के होते हुए कोई भी स्तर निम्नतम नहीं हो सकता। 

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